पर्यावरण तथा पारिस्थितिकी निबन्ध

1. जीवन में वक्षों का महत्त्व (2018)
अन्य शीर्षक
 वृक्ष हमारे जीवन साथी
संकेत बिन्दु भूमिका, हमारे जीवन में वनों की उपयोगिता/लाभ, पर्यावरण को सन्तुलित करना, वृक्षारोपण का महत्त्व, उपसंहार।।

भूमिका पेड़-पौधों के महत्त्व को कभी भी कमतर नहीं आंका जा सकता, क्योंकि ये हमारे जीवन के लिए अत्यन्त आवश्यक हैं। प्रकृति ने घनों ने रूप में हमें एक ऐसा प्राकृतिक सौन्दर्य उपलब्ध कराया है, जो न सिर्फ हमारी प्राकृतिक शोभा को बढ़ाते हैं, अपितु किसी भी देश के आर्थिक विकास व उसकी समृद्धि में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। आर्थिक विकास के लिए वन केवल कच्चे माल की पूर्ति ही नहीं करते वरन् बाढ़ को नियन्त्रित करके भूमि के कटाव को भी रोकते हैं।

हमारे जीवन में वनों की उपयोगिता/लाभ वन हमारे जीवन के लिए बहुत उपयोगी है, किन्तु सामान्य व्यक्ति इनके महत्त्व को समझ नहीं पाते। वे वनों को प्राकृतिक सीमा मात्र मानते हैं। दैनिक जीवन में वनों का महत्त्वपूर्ण स्थान है। वन हमें रमणीक स्थान प्रदान करते हैं। वृक्षों के अभाव में पर्यावरण शुष्क हो जाता है और पर्यावरण का सौन्दर्य नष्ट हो जाता है। वृक्ष स्वयं सौन्दर्य की सृष्टि करते है। गर्मी के दिनों में बहुत से पर्यटक पहाड़ों पर जाकर वनों की शोभा देखते हैं। वनों से हमें विभिन्न प्रकार की लकड़ियाँ; जैसे-इमारती लकड़ी, जलाने की लकड़ी, दवाई में प्रयोग होने वाली लकड़ी आदि प्राप्त होती हैं। वृक्षों की लकड़ियाँ व्यापारिक दृष्टि से भी उपयोगी होती हैं। इनमें सागौन, देवदार, चीड़, शीशम, चंदन, आबनूस इत्यादि। प्रमुख हैं।

वनों से लकड़ी के अतिरिक्त अनेक उपयोगी वस्तुओं की प्राप्ति भी होती है, जिनका अनेक उद्योग में कच्चे माल के रूप में उपयोग किया जाता है; जैसे—फर्नीचर उद्योग, औषधि उद्योग इत्यादि। वनों से हमें विभिन्न प्रकार के फल प्राप्त होते हैं, जो मनुष्य का पोषण करते हैं। ऋषि-मुनि वनों में रहकर कन्दमूल एवं फलों पर ही अपना जीवन निर्वाह करते थे। वनों से हमें अनेक जड़ी बूटियाँ प्राप्त होती हैं। वनों से प्राप्त जड़ी-बूटियों से कई असाध्य रोगों की दवाई प्राप्त होती है। कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर ने पेड़-पौधों की महत्ता को समझते हुए कहा है।

“पृथ्वी द्वारा स्वर्ग से बोलने का अथक प्रयास हैं ये पेड़

पर्यावरण को सन्तुलित करना वन वायु को शुद्ध करते हैं, क्योंकि वृक्ष कार्बन डाइऑक्साइड को ग्रहण करके ऑक्सीजन छोड़ते हैं, जिससे पर्यावरण शुद्ध होता है। यह सत्य है कि “वृक्ष धरा के हैं आभूषण, करते हैं ये दूर प्रदूषण।” इस प्रकार वनों से वातावरण का तापक्रम, नमी और वायु प्रवाह नियर्मित होता है, जिससे जलवायु में सन्तुलन बना रहता है। वन जलवायु की भीषण उष्णता को सामान्य बनाए रखते हैं, ये आँधी-तूफानों से हमारी रक्षा करते हैं तथा गर्मी और तेज हवाओं को रोककर देश की जलवायु को समशीतोष्ण बनाए रखते हैं। इसके परिणामस्वरूप पृथ्वी का पर्यावरण असन्तुलित हो गया है। वृक्षारोपण पर्यावरण को सन्तुलित कर मानव के अस्तित्व की रक्षा करने के लिए आवश्यक है। एक मेज, एक कर्मी, एक कटोरा फल और एक वायलन; भला खुश रहने के लिए और क्या चाहिए।’

2. अन्य पर्यावरण प्रदूषण : समस्या और समाधान (2018, 16, 15, 14, 13, 12, 11, 10)
अन्य शीर्षक औद्योगिक प्रदूषण : समस्या और समाधान (2004), पर्यावरण संरक्षण (2010), वन सम्पदा और पर्यावरण (2012, 11), जीवन रक्षा : पर्यावरण सुरक्षा (2014, 13), पर्यावरण एवं स्वास्थ्य (2013), पर्यावरण की उपयोगिता, पर्यावरण प्रदूषण से हानियाँ (2012), प्रदूषण, पर्यावरण एवं मानव जीवन (2013)
संकेत बिन्दु भूमिका, प्रदूषण का तात्पर्य, प्रदूषण के कारण, प्रदूषण के दुष्परिणाम, प्रदूषण निवारण के उपाय, उपसंहार।

भूमिका प्रदूषण के विभिन्न प्रकारों में पर्यावरणीय प्रदूषण एक गम्भीर समस्या है। यह भारत की ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व की भी समस्या है। इस समस्या से निपटने के लिए अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अनेक प्रयास किए जा रहे हैं।

सम्पूर्ण मानव जाति के अस्तित्व को समाप्त कर सकने में सक्षम इस वैश्विक समस्या पर अब समस्त विश्व समुदाय एकजुट हैं और इसके निवारण के उपायों की खोज में जुटा है। उल्लेखनीय है कि इससे विश्व का पर्यावरण तो प्रदूषित हो हो हो है, साथ ही इसके दुष्ट परिणामस्वरूप कई अन्य जटिल समस्याएँ भी उत्पन्न हो रही हैं।

प्रदूषण का तात्पर्य नि:सन्देह सौरमण्डल में पृथ्वी ही एकमात्र ऐसा ग्रह है, जहाँ जीवन के होने के पूर्ण प्रमाण विद्यमान हैं। पृथ्वी के वातावरण में 78% नाइट्रोजन, 21% ऑक्सीजन तथा 1% अन्य गैसें शामिल हैं। इन गैसों का पृथ्वी पर समुचित मात्रा में होना जीवन के लिए अनिवार्य है, किन्तु जब इन गैसों का आनुपातिक सन्तुलन बिगड़ जाता है, तो जीवन के लिए प्रतिकूल परिस्थितियां उत्पन्न हो जाती हैं। विश्व में आई औद्योगिक क्रान्ति के बाद से ही प्राकृतिक संसाधनों का दोन शुरू हो गया था, जो उन्नीसवीं एवं बीसवीं शताब्दी में अपने चरम पर था, कुपरिणामस्वरूप पृथ्वी पर गैसों का आनुपातिक सन्तुलन बिगड़ गया, जिससे विश्व की जलवायु पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा एवं प्रदूषण का स्तर इतना अधिक बढ़ गया कि यह अनेक जानलेवा बीमारियों का कारक बन गया। इस तरह पर्यावरण में प्रदूषको (अपशिष्ट पदार्थों) का इस अनुपात में मिलना, जिससे पर्यावरण का सन्तुलन बिगड़ता है, प्रदूषण कहलाता है। प्रदूषण के कई रूप हैं—जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण, मृदा प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण इत्यादि।

प्रदूषण के कारण उद्योगों से निकलने वाले रासायनिक अपशिष्ट पदार्थ जल एवं मृदा प्रदूषण का तो कारण बनते ही हैं, साथ ही इनके कारण वातावरण में विषैली गैसों के फैलने से वायु भी प्रदूषित होती है। मनुष्य ने अपने लाभ के लिए जंगलों की तेज़ी से कटाई की है। जंगल के पेड़ प्राकृतिक प्रदूषण नियन्त्रक का काम करते हैं। पेड़ों के पर्याप्त संख्या में न होने के कारण भी वातावरण में विषैली गैसें जमा होती रहती हैं और उसका शोधन नहीं हो पाता। मनुष्य सामान ढोने के लिए पॉलिथीन का प्रयोग करता है। प्रयोग के बाद इन पॉलिथीनों को यूं ही फेंक दिया जाता है। ये पॉलिथीने नालियों को अवरुद्ध कर देती हैं, जिसके फलस्वरूप पानी एक जगह जमा होकर प्रदूषित होता रहता है।

इसके अतिरिक्त, ये पॉलिथीन भूमि में मिलकर उसकी उर्वरा शक्ति को कम कर देती हैं। प्रौद्योगिकी में प्रगति के साथ ही मनुष्य की मशीनों पर निर्भरता बढ़ी है। मोटर, रेल, घरेलू मशीनें इसके उदाहरण हैं। इन मशीनों से निकलने वाला धुआं भी पर्यावरण के प्रदूषण के प्रमुख कारकों में से एक है। बढ़ती जनसंख्या को भोजन उपलब्ध करवाने के लिए खेतों में रासायनिक उर्वरकों के प्रयोग में वृद्धि हुई है।

इसके कारण भूमि की उर्वरा शक्ति का ह्रास हुआ है। रासायनिक एवं चमड़े के उद्योगों के अपशिष्टों को नदियों में बहा दिया जाता है। इस कारण जल प्रदूषित हो  जाता है एवं नदियों में रहने वाले जन्तुओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

प्रदूषण के दुष्परिणाम पर्यावरण प्रदूषण के कई दुष्परिणाम सामने आए हैं। इसका सर्वाधिक प्रतिकूल प्रभाव मानव के स्वास्थ्य पर पड़ा है। प्रदूषण के कारण आज मनुष्य का शरीर अनेक बीमारियों का घर बनता जा रहा है। खेतों में रासायनिक उर्वरकों के माध्यम से उत्पादित खाद्य-पदार्थ स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से सही नहीं है। वातावरण में घुली विषैली गैसों एवं धुएँ के कारण शहरों में मनुष्य का साँस लेना भी दूभर होता जा रहा है।

विश्व की जलवायु में तेजी से हो रहे परिवर्तन का कारण भी पर्यावरणीय असन्तुलन एवं प्रदूषण ही हैं। ओजोन परत में छिद्र की समस्या भी प्रदूषण की ही उपज हैं। वर्ष 2014 के अन्त में यू.एन.ई.पी द्वारा जारी की गई रिपोर्ट के अनुसार प्रतिवर्ष वायु प्रदूषण से जुड़ी लगभग एक लाख मौतें भारत सहित अमेरिका, ब्राजील, चीन, यूरोपीय संघ व मैक्सिको में होती हैं। यह रिपोर्ट पर्यावरण प्रदूषण से होने वाली हानियों का जीता-जागता सबूत है।

प्रदूषण निवारण के उपाय पर्यावरण प्रदूषण को दूर करने के लिए हमें कुछ आवश्यक उपाय करने होंगे। मनुष्य स्वाभाविक रूप से प्रकृति पर निर्भर है। प्रकृति पर उसकी निर्भरता तो समाप्त नहीं की जा सकती, किन्तु प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करते समय हमें इस बात का ध्यान रखना पड़ेगा कि इसका प्रतिकूल प्रभाव पर्यावरण पर न पड़ने पाए, इसके लिए हमें उद्योगों की संख्या के अनुपात में बड़ी संख्या में पेड़ों को लगाने की आवश्यकता हैं। इसके अलावा पर्यावरण प्रदूषण को कम करने के लिए हमें जनसंख्या को स्थिर बनाए रखने की भी आवश्यकता है, क्योंकि जनसंख्या में वृद्धि होने से स्वाभाविक रूप से जीवन के लिए अधिक प्राकृतिक संसाधनों की आवश्यकता पड़ती हैं और इन आवश्यकताओं को पूरा करने के प्रयास में उद्योगों की स्थापना होती है और उद्योग कहीं-न-कहीं प्रदूषण का कारक भी बनते हैं।

यदि हम चाहते हैं कि प्रदूषण कम हो एवं पर्यावरण की सुरक्षा के साथ-साथ सन्तुलित विकास भी हो, तो इसके लिए हमें नवीन प्रौद्योगिकी का प्रयोग करना होगा। प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा तब ही सम्भव है, जब हम इसका उपयुक्त प्रयोग करें। हमें अपने पूर्व राष्ट्रपति श्री ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के इस कथन से सीख लेने की आवश्यकता है- “हम सबको विज्ञान और प्रौद्योगिकी के अनुप्रयोग के माध्यम से पानी, ऊर्जा, निवास स्थान, कचरा प्रबन्धन तथा पर्यावरण के क्षेत्रों में पृथ्वी द्वारा झेली जाने वाली समस्याओं को दूर करने के लिए कार्य करने चाहिए।’

उपसंहार वस्तुतः पर्यावरण प्रदूषण एक वैश्विक समस्या है, जिससे निपटना वैश्विक स्तर पर ही सम्भव हैं, किन्तु इसके लिए प्रयास स्थानीय स्तर पर भी किए जाने चाहिए। विकास एवं पर्यावरण एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं, अपितु एक दूसरे के पूरक हैं। सन्तुलित एवं शुद्ध पर्यावरण के बिना मानव का जीवन कष्टमय हो जाएगा। हमारा अस्तित्व एवं जीवन की गुणवत्ता एक स्वस्थ प्राकृतिक पर्यावरण पर निर्भर है। विकास हमारे लिए आवश्यक है और इसके लिए प्राकृतिक संसाधनों का दोहन भी आवश्यक है, किन्तु ऐसा करते समय हमें सतत् विकास की अवधारणा को अपनाने पर जोर देना होगा तभी हमारा पर्यावरण सुरक्षित रह सकेगा। पृथ्वी के बढ़ते तापक्रम को नियन्त्रित कर, जलवायु परिवर्तन को कम करने के लिए देशी तकनीकों से बने उत्पादों का उत्पादन तथा उपभोग जरूरी है। इसके साथ ही प्रदूषण को कम करने के लिए सामाजिक तथा कृषि वानिकी के माध्यम से अधिक-से-अधिक पेड़ लगाए जाने की भी आवश्यकता है। यदि हम इन बातों पर ध्यान दें, तो पर्यावरण प्रदूषण की समस्या से काफी हद तक निपटा जा सकता है।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *