शब्दों में सूक्ष्म अन्तर 12

शब्दों में सूक्ष्म अन्तर

नवीनतम पाठ्यक्रम में शब्द-रचना के अन्तर्गत शब्दों के सूक्ष्म अन्तर को सम्मिलित किया गया है, जिसके लिए विभिन्न प्रकार के शब्द-युग्मों का अध्ययन किया जाना चाहिए। इसके लिए 2 अंक निर्धारित हैं। शब्द-युग्म से अभिप्राय है-शब्दों का जोड़ा। विभिन्न प्रकार के शब्दों के जोड़े बनाकर शब्द-रचना की जाती है।

शब्द-युग्म में दो स्वतन्त्र अर्थ वाले शब्द होते हैं, जो अलग-अलग रहने पर तो पृथक्-पृथक् अर्थ देते हैं, किन्तु जब उन शब्दों का युग्म बनाकर एक शब्द के रूप में प्रयोग किया जाता है तो वे शब्द अपने अर्थों से भिन्न अर्थ देने लगते हैं; उदाहरणार्थ-‘दिन’ और ‘रात’ दो पृथक्-पृथक् अर्थ रखने वाले शब्द हैं, किन्तु जब इन शब्दों का युग्म बनाकर एक शब्द के रूप में प्रयोग किया जाता है, तो ये दोनों शब्द अपने-अपने अर्थ को त्यागकर एक नवीन अर्थ का बोध कराने लगते हैं; जैसे—

  1. लोग दिन में जागते हैं और रात को सोते हैं।
  2. दिनेश ने रात-दिन कड़ी मेहनत की है।

यहाँ प्रथम वाक्य में ‘रात’ और ‘दिन’ अपने वास्तविक अर्थ को व्यक्त कर रहे हैं, किन्तु द्वितीय वाक्य में जब वे युग्म के रूप में प्रयुक्त हुए हैं तो वे अपने मूल अर्थ को छोड़कर एक नवीन अर्थ को व्यक्त कर रहे हैं। यहाँ ‘रात-दिन’ शब्द ‘निरन्तरता’ को व्यक्त कर रहा है। इस प्रकार शब्द-युग्म के रूप में एक नवीन अर्थबोधक शब्द की रचना हो गयी है।
शब्द-युग्मों की रचना-शब्द-युग्मों की रचना निम्नलिखित सात प्रकारों से की जाती है-

  1. एक ही शब्द की पुनरुक्ति द्वारा,
  2. सजातीय या समानार्थक शब्दों के द्वारा,
  3. विलोम शब्दों के द्वारा,
  4. सार्थक और निरर्थक शब्दों के द्वारा,
  5. निरर्थक शब्दों के द्वारा,
  6. परसर्गों के साथ शब्द की पुनरावृत्ति द्वारा,
  7. समोच्चारित भिन्नार्थक शब्दों के द्वारा।। उपर्युक्त विधियों द्वारा निर्मित शब्द-युग्म जिन नवीन अर्थों का बोध कराते हैं, उन्हें वाक्य प्रयोग द्वारा भली प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है।

(1) एक ही शब्द की पुनरुक्ति द्वारा
पुनरुक्ति = पुनः + उक्ति; अर्थात् एक ही शब्द को फिर से कहना उस शब्द की पुनरुक्ति कहलाता है। पुनरुक्ति भी शब्द-युग्म बनाने का प्रमुख तत्त्व है। इसमें एक ही शब्द को प्राय: एक बार दोहराकर शब्द-युग्म बनाया जाता है, किन्तु जब किसी ध्वनि के द्वारा किसी क्रिया को बताया जाता है, तब ध्वनिवाचक शब्द की एक बार से अधिक आवृत्ति की जाती है। साहित्य में इसे ध्वन्यर्थ अलंकार के नाम से जाना जाता है। एक और अनेक आवृत्ति द्वारा शब्द-युग्म बनाने की प्रक्रिया को निम्नवत् समझा जा सकता है–

शब्द-युग्म                        वाक्य-प्रयोग।
1. अंग-अंग – माँ ने अपने बेटे का अंग-अंग चूम डाला।
2. अपना-अपना – आज सभी अपना-अपना राग अलापने में लगे हैं।
3. कोना-कोना – कस्तूरी की सुगन्ध से वन का कोना-कोना महक उठा।
4. खाली-खाली – बच्चों के बिना घर खाली-खाली लगता है।
5. गाँव-गाँव – आज गाँव-गाँव में बिजली पहुँच गयी है।
6. गाते-गाते – गाते-गाते रात कट गयी।
7. घर-घर – घर-घर में सास-बहू की एक ही कहानी है।
8. छिपते-छिपते – सूरज के छिपते-छिपते मैं घर पहुँच गया।
9. तार-तार – उसके तन के कपड़े तार-तार हो गये।
10. पानी-पानी – अपनी गलती पर वह शर्म से पानी-पानी हो गयी।
11. बूंद-बूंद – कल लोग बूंद-बूंद पानी के लिए तरस जाएँगे।
12. मचल मचल – कश्मीर के सौन्दर्य परे मन मचल-मचल जाता है।
13. रटते-रटते – तुम्हें एक ही बात रटते-रटते दो घण्टे हो गये।
14. रोम-रोम – श्रीराम को देखकर हनुमान जी का रोम-रोम पुलकित हो गया।
15. लम्बी-लम्बी – ईदगाह पर नमाजियों की लम्बी-लम्बी कतारें लगती हैं।
16. सहते-सहते – पति के अत्याचार सहते-सहते अन्तत: निर्मला टूट ही गयी।
17. साफ-साफ – मैं साफ-साफ कहने में विश्वास रखता हूँ।
18. हँसते-हँसते – दु:खों का हँसते-हँसते ही सामना करना चाहिए।
19. छम-छम-छम – उसके पैरों के घुघरू छम-छम-छम कर बज उठे।
20. झम-झमझम – देखते-ही-देखते झम-झम-झम वर्षा होने लगी।
21. गुन-गुन-गुन – गुन-गुन-गुन भौंरे गाते हैं।

(2) सजातीय या समानार्थक शब्दों के द्वारा
सजातीय अथवा समानार्थक लगने वाले दो शब्दों को मिलाकर भी शब्द-युग्म की रचना की जाती है। इसमें दोनों ही शब्द मिलते-जुलते अर्थ देने वाले होते हैं, किन्तु दोनों का अर्थ एक नहीं होता; जैसे-
शब्द-युग्म                          वाक्य-प्रयोग
1. ईर्ष्या-द्वेष – मन में ईष्र्या-द्वेष रखकर कोई सुखी नहीं रह सकता है।
2. उद्योग-धन्धे – सरकार को उद्योग-धन्धों पर विशेष बल देना चाहिए।
3. ऋद्धि-सिद्धि – भगवान् की भक्ति ही सभी ऋद्धि-सिद्धि देने वाली होती है।
4. खेल-तमाशा – अब खेल-तमाशों का समय नहीं रहा है।
5. चमक-दमक – व्यक्ति को बाहरी चमक-दमक से बचना चाहिए।
6. जादू-टोना – जादू-टोना अब गुजरे हुए कल की बातें हैं।
7. झाड़-पोंछ – किसी भी सामान की झाड़-पोंछ आवश्यक है।
8. तोड़-फोड़ – उपद्रवियों ने पूरे शहर में अत्यधिक तोड़-फोड़ की।
9. दीन-हीन – दीन-हीन को सताना अच्छी बात नहीं है।
10. धन-दौलत – धन-दौलत से सुख नहीं खरीदा जा सकता।
11. फल-फूल – उपवास में महाराज जी केवल फल-फूल ही खाते हैं।
12. मार-पीट – बच्चों को मार-पीट कर नहीं सुधारा जा सकता।
13. रीति-रिवाज – रीति-रिवाज हमारी संस्कृति के अभिन्न अंग हैं।
14. विधि-विधान – सभी कार्य विधि-विधानपूर्वक सम्पन्न हुए।
15. साधु-सन्त – कबीर सदैव साधु-सन्तों की संगत में रहते थे।
16. हँसी-खुशी – सभी के दिन हँसी-खुशी से बीते।

(3) विलोम शब्दों के द्वारा
दो विलोम शब्दों को मिलाकर भी शब्द-युग्म की रचना की जाती है। इस प्रकार के शब्द-युग्मों से युक्त वाक्य प्रायः सूक्तिपरक और नैतिकता से ओत-प्रोत होते हैं; जैसे-
शब्द-युग्म                     वाक्य-प्रयोग
1. आगे-पीछे – लोग नेताओं के आगे-पीछे घूमते-फिरते हैं।
2. आना-जाना – उनका बाहर आना-जाना लगा ही रहता है।
3. उचित-अनुचित – मनुष्य को उचित-अनुचित का ध्यान रखना ही चाहिए।
4. गुण-दोष – मित्रों के गुण-दोष की परख विपत्ति में ही होती है।
5. रात-दिन – रात-दिन पढ़ाई में जुटकर मैंने प्रथम श्रेणी पायी है।
6. धर्म-अधर्म – धर्म-अधर्म को सभी धर्मग्रन्थों ने एक समान रूप में परिभाषित किया है।
7. न्याय-अन्याय – व्यक्ति को प्रत्येक कार्य में न्याय-अन्याय का ध्यान अवश्य रखना चाहिए।
8. मान-अपमान – सज्जन मान-अपमान को एक समान लेते हैं।
9. शुभ-अशुभ – कर्मशील व्यक्ति शुभ-अशुभ का विचार नहीं करते।
10. सवाल-जवाब – इन व्यर्थ के सवाल-जवाब का क्या औचित्य है ?
11. साधु-असाधु – किसी व्यक्ति के कार्य ही उसे साधु-असाधु की श्रेणी में रखते हैं।
12. सोते-जागते – उसे सोते-जागते कमाने की ही धुन सवार रहती है।
13. होनी-अनहोनी – होनी-अनहोनी दोनों ही नहीं टलतीं।
14. ज्ञान-अज्ञान – ज्ञान-अज्ञान को जानने वाला ही विद्वान् है।

(4) सार्थक और निरर्थक शब्दों के द्वारा
यद्यपि निरर्थक शब्दों को भाषा में शब्द ही नहीं माना जाता और इसी कारण उनका अध्ययन भी भाषा के अन्तर्गत नहीं किया जाता, तथापि इन निरर्थक शब्दों का भी भाषा में बड़ा महत्त्व है। सार्थक शब्दों के साथ मिलाकर जब इनसे शब्द-युग्म की रचना की जाती है तो ये सार्थक हो उठते हैं। यहाँ यह बात ध्यान देने योग्य है कि शब्द-युग्म द्वारा जब ये निरर्थक शब्द सार्थक हो उठते हैं, तब भी उनके अर्थ को सार्थक शब्द के अर्थ से पृथक् करके नहीं देखा जा सकता। इनकी सार्थकता सदैव अपने साथ प्रयुक्त होने वाले सार्थक शब्दों पर ही निर्भर करती है। इस प्रकार के शब्द-युग्मों में सार्थक शब्द पहले अथवा बाद में कहीं भी आ सकता है; जैसे-
शब्द-युग्म                            वाक्य-प्रयोग
1. आमने-सामने – जरा–सी बात पर दोनों भाई आमने-सामने आ गये।
2. आस-पास – हमारे आस-पास का वातावरण बड़ी सुहावना था।
3. उल्टा-पुल्टा – बच्चों ने जरा-सी देर में सब-कुछ उल्टा-पुल्टा कर दिया।
4. खाना-वाना – बहुत देर हो गयी है अब खाना-वाना खाना है या नहीं।
5. घर-वर – अब घर-वर चलोगे या नहीं।
6. चाय-शाय – अरे भई गौरव को चाय-शाय पिलायी या नहीं ?
7. चिट्ठी-विट्ठी – नीरज कोई चिट्ठी-विट्ठी नहीं लिखता।
8. ठीक-ठाक – घर पर सब ठीक-ठाक है।
9. देख-भाल – बच्चों की उचित देख-भाल एक पढ़ी-लिखी माँ ही कर सकती है।
10. बची-खुचा – मैंने बचा-खुचा सामान भिखारी को दे दिया।
11. भीड़-भाड़ – आजकल शहरों में सभी जगह भीड़-भाड़ है।
12. मिठाई-विठाई – बच्चों को ज्यादा मिठाई-विठाई नहीं खानी चाहिए।
13. चाकू-वाकू – मैंने कोई चाकू-वाकू नहीं देखा।
14. गुम-सुम – वह अकसर गुम-सुम रहता है।
15. तोल-ताल – सामान को जल्दी से तोल-ताल पर छुट्टी करो।।
16. मार-धाड़ – अब मार-धाड़ वाली फिल्में ही अधिक बनती हैं।
17. ठाट-बाट – दिनेश के ठाट-बाट देखते ही बनते हैं।
18. पीट-पाट – अब तुम यहाँ से तुरन्त चले जाओ नहीं तो कोई पीट-पाट देगा।

(5) निरर्थक शब्दों के द्वारा
साधारण बोलचाल की भाषा में दो निरर्थक शब्दों को मिलाकर उनसे शब्द-युग्म की रचना करके एक विशेष अर्थ की अभिव्यक्ति की जाती है; जैसे-
शब्द-युग्म                वाक्य-प्रयोग
1. अफरा-तफरी – अचानक मंत्री जी के आने की खबर सुनकर कार्यालय में अफरा-तफरी मच गयी।
2. इक्के-दुक्के – रात में इक्के-दुक्के लोग ही पार्क में घूमते हैं।
3. ऊल-जलूल – उसकी ऊल-जलूल बातों पर कौन ध्यान देता है?
4. चूं-चपड़ – जाओ अब अपना रास्ता देखो, ज्यादा चूं-चपड़ मत करो।
5. हेक्का-बक्का – भाई की मृत्यु का समाचार सुनकर वह हक्का-बक्का रह गया।
6. हट्टा-कट्टा – वैभव देखने में हट्टा-कट्टा लगता है।

(6) परसर्गों के साथ शब्द की पुनरावृत्ति द्वारा
पुनरावृत्ति द्वारा बने शब्द-युग्मों के मध्य परसर्ग लगाकर भी शब्द-युग्म की रचना की जाती है। इस प्रकार के शब्द-युग्म में परसर्ग के दोनों ओर संयोजक चिह्न लगाते हैं; जैसे-
शब्द-युग्म                       वाक्य-प्रयोग
1. अपनी-ही-अपनी – सब अपनी-ही-अपनी चलाते हैं, दूसरों की कोई नहीं सुनता।
2. आगे-ही-आगे – चोर पुलिस के आगे-ही-आगे दौड़ता हुआ गायब हो गया।
3. ऊपर-ही-ऊपर – झीलों में बर्फ ऊपर-ही-ऊपर जमती है।
4. और-ही-और – लक्ष्मी के जन्म से गिरधर की हालत और-ही-और होती चली गयी।
5. कभी-न-कभी – कभी-न-कभी तो उसके दिन भी फिरेंगे।
6. कहीं-न-कहीं – यह दवाई हूँढ़ने पर कहीं-न-कहीं मिल ही जाएगी।
7. कुछ-का-कुछ – डर के मारे वह कुछ-का-कुछ कहने लगा।
8. ढेर-का-ढेर – खलिहान में गेहूं का ढेर-का-ढेर जलकर राख हो गया।
9. नीचे-ही-नीचे – वह नदी में नीचे-ही-नीचे तैर लेता है।
10. लोग-ही-लोग – संगम पर जहाँ तक दृष्टि जाती है, लोग-ही-लोग दिखते हैं।

(7) समोच्चारित भिन्नार्थक शब्दों के द्वारा
जो शब्द उच्चारण में लगभग समान प्रतीत होते हैं, परन्तु उनके अर्थ भिन्न होते हैं, उन्हें समोच्चारित भिन्नार्थक शब्द-युग्म भी कहा जाता है; यथा-
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बहुविकल्पीय प्रश्न

शब्दों में सूक्ष्म अंतर प्रश्न (क)
निम्नलिखित शब्द-युग्मों में से किसी एक शब्द-युग्म में बताइए कि उसका कौन-सा अर्थ सही है-

(1) अनल-अनिल [2009, 11, 15, 17]
(क) पृथ्वी और आकाश
(ख) अग्नि और वायु
(ग) जल और वायु
(घ) पानी और आग

(2) सकल-शकल [2010, 17]
(क) कला और कृति
(ख) सन् और सम्वत्
(ग) सम्पूर्ण और अंश
(घ) सबल और निर्बल

(3) पुरुष-परुष—- (2015, 17]
(क) नर और नारी
(ख) आदमी और फरसा
(ग) पुरुष और पैसा
(घ) आदमी और कठोर

(4) गृह-ग्रह
(क) घर और नक्षत्र
(ख) घर और गृहस्थी
(ग) गिरोह और घर
(घ) गाँव और घर

(5) वृत्त-वित्त
(क) चरित्र और धन
(ख) धन और दौलत
(ग) गिरोह और घर
(घ) गाँव और घर

(6) बात-वात
(क) भात और दाल
(ख) बातचीत और वायु
(ग) हवा और पानी
(घ) बाट और तराजू

(7) कपट-कपाट [2016]
(क) कप और प्लेट
(ख) किवाड़ और खिड़की
(ग) धोखा और दरवाजा
(घ) पर्दा और किवाड़

(8) पतन-पत्तन-
(क) गिरना और उठना
(ख) पत्ता और फूल
(ग) गिरना और बन्दरगाह
(घ) पर्दा और किवाड़

(9) सुत-सूत [2012]
(क) पुत्र और पिता
(ख) पुत्र और सारथी
(ग) पुत्र और माता
(घ) पुत्र और पत्नी।।

(10) अभिराम-अविराम [2009, 10, 14, 15, 17]
(क) सुन्दर और लगातार
(ख) राम और लक्ष्मण
(ग) अब और तब
(घ) सुन्दर और मजबूत।

(11) पास-पाश [2010]
(क) उत्तीर्ण और निकट
(ख) निकट और जाल
(ग) निकट और ऊँचा
(घ) समीप और दूर

(12) पंथ-पथ-
(क) पथिक और रास्ता
(ख) सम्प्रदाय और मार्ग
(ग) चलना और बैठना
(घ) मार्ग और कार्य

(13) अभय-उभय-
(क) निडर और दोनों
(ख) भयरहित और निडर
(ग) निर्भय और कायर
(घ) आभायुक्त और अन्य

(14) अम्बुज-अम्बुद– [2013, 14, 16]
(क) कमल और बादल
(ख) जल और कमल
(ग) बादल और समुद्र
(घ) समुद्र और कमल

(15) मेघ-मेध–
(क) बादल और कील
(ख) बादल और यज्ञ
(ग) काला और बुद्धि
(घ) बादल और चर्बी

(16) अंस-अंश [2013,17]
(क) अंकुर और हिस्सा
(ख) हिस्सा और अंकुर
(ग) कंधा और हिस्सा
(घ) हिस्सा और कंधा।

(17) जलज-जलद [2009, 14, 16]
(क) बादल और कमल
(ख) कमल और बादल
(ग) कमल और तालाब
(घ) तालाब और कमल

(18) अन्न-अन्य–
(क) अनाज और दूसरा
(ख) भोजन और अनेक
(ग) गेहूँ और वह
(घ) बेकार और दूसरा

(19) उपकार-अपकार [2013]
(क) दूसरे का कार्य और बुरा
(ख) पुकार और न बोलना
(ग) भलाई और बुराई
(घ) अच्छा और दुष्ट

(20) अचार-आचार-
(क) बुरा आचरण और अच्छा
(ख) मुरब्बा और आचरण
(ग) स्थिर और चल
(घ) आम और चारा

(21) भित्ति-भीत–
(क) भक्ति और भाग्य
(ख) द्वार और दीवार
(ग) दीवार और डरा हुआ
(घ) बाहर और भीतर

(22) अमूल्य-अमूल-
(क) मूल-रहित और दूध
(ख) मूलरहित और जड़ रहित
(ग) मूल्य सहित और मूलभूत
(घ) अधिक मूल्यवाला और मूर्ख

(23) भारती-भारतीय
(क) सरस्वती और भारत का रहने वाला।
(ख) भार ढोने वाली और भर्ती करने वाला
(ग) भार में लगी हुई और चुनाव
(घ) एक जाति और एक व्यक्ति

(24) श्रान्त-आन्ति-
(क) थकान और खिन्नता
(ख) शान्ति और खिन्नता
(ग) खिल और थकान
(घ) शस्त और अशान्त।

(25) प्रारम्भ-प्रारब्ध-
(क) आरम्भ और योजना
(ख) अथ और इति
(ग) आरम्भ और भाग्य
(घ) शुरू करने की स्थिति और समाप्ति

(26) छात्र-क्षात्र– [2011,14]
(क) छतरीधारी और विद्यार्थी
(ख) विद्यार्थी और नेता
(ग) क्षत्रियधर्मी और विद्यार्थी
(घ) विद्यार्थी और क्षत्रियोचित

(27) नियत-नियति [2013]
(क) निश्चित और भाग्य
(ख) आदत और भाग्य
(ग) प्रकृति और गणना
(घ) आदत और गणना

(28) वहन-बहन
(क) टोना-भागिनी
(ख) बहना-बहिनी
(ग) ढोना-बहना
(घ) ढोना-ढहाना

(29) आय-आयु
(क) आना-उम्र
(ख) आमदनी-उम्र
(ग) आना-आज्ञा
(घ) आमदनी-आना

(30) श्रवण-श्रमण
(क) पाप और पुण्य
(ख) सज्जन और दुर्जन
(ग) कान और भिक्षु
(घ) सावन और परिश्रमी

(31) अंश-अंशु– [2015, 17]
(क) भाग और सूर्य
(ख) सूर्य और भाग
(ग) भाग और किरण
(घ) भाग और वरुण

(32) कटिबंध-कटिबद्ध-
(क) फेंटा और तैयार
(ख) करधनी और तैयार
(ग) तैयार और बाजूबन्द
(घ) उद्यत और उद्धत

(33) निहत-निहित–
(क) डरा हुआ और छिपा हुआ
(ख) छिपा हुआ और डरा हुआ
(ग) मरा हुआ और छिपा हुआ
(घ) हारा हुआ और मरा हुआ

(34) बिहग-बिहंग
(क) पक्षी और बालक
(ख) पक्षी और तोता
(ग) पक्षी और आकाश
(घ) आकाश और पक्षी

(35) अतिथि-अतिथेय (2010)
(क) जिसके आने की कोई तिथि न हो–अतिथि सेवा करने वाला
(ख) अधिक तिथि–आने वाली तिथि
(ग) अतिथिविहीन-तिथि सहित
(घ) जिसके आने की तिथि हो-जो निश्चित तिथि पर आये

(36) अग-अघ [2010,16]
(क) आगे-पीछे
(ख) अचल-पाप
(ग) नया–पुराना
(घ) सम्पूर्ण-पुण्य

(37) आरत-आराति [2012]
(क) आरती और आरती करने वाला
(ख) प्रेमी और प्रेम से रहित
(ग) दु:ख और शत्रु
(घ) रात्रि के पहले और रात्रि के बाद

(38) जलद-जलधि [2012]
(क) कमल और समुद्र
(ख) बादल और समुद्र
(ग) सिन्धु और आकाश
(घ) जलना और जो जला न हो

(39) श्वपच-स्वपच– [2012]
(क) दुष्ट और सज्जन
(ख) चाण्डाल और स्वयंपाकी
(ग) स्वयंपाकी और चाण्डाल
(घ) दुर्जन और साधु

(40) आतप-आपात [2012]
(क) धूप और संकट
(ख) संकट और धूप
(ग) धूप और छाया
(घ) उजाला और अँधेरा

(41) आवरण-आभरण- [2016]
(क) प्रारम्भ और अन्त
(ख) परदा और अन्त
(ग) परदा और गहना
(घ) मृत्यु और ढकना

(42) दुर्लभ-अप्राप्य [2013]
(क) कठिनाई से मिले – बिलकुल न मिले
(ख) हर समय मिले – कभी न मिले
(ग) कभी-कभी मिले – हर समय न मिले
(घ) मिलता हो – खो जाता हो।

(43) उच्छृखल-उद्दण्ड [2013]
(क) तत्पर और उद्धत
(ख) अवांछनीय और साहसी
(ग) नियमबद्ध न होना और जो दण्ड से न डरता हो
(घ) अन्याय से उत्पन्न भय और डर से उत्पन्न व्याकुलता

(44) निद्रा-तन्द्रा [2013]
(क) सो जाना और नींद की अर्द्ध-अवस्था या ऊँघना
(ख) नींद और आलस्य
(ग) जागना और सोने जैसी स्थिति
(घ) आलस्य और जाग्रत

(45) आपात-ऑपाद [2014]
(क) विपदा और सम्पदा
(ख) सुख और दुःख
(ग) संकट और निष्कण्टक
(घ) संकटे और पैर तक

(46) क्षति-क्षिति [2014]
(क) हानि और लाभ
(ख) हानि और आकाश
(ग) आकाश और पृथ्वी
(घ) हानि और पृथ्वी

(47) अम्ब-अम्भ (2015)
(क) माता और पानी
(ख) माता और पिता
(ग) आकाश और स्वर्ग
(घ) देवी और देवता

(48) अलि-आली (2015)
(क) भौंरा और सखी
(ख) भौंरा और कली
(ग) कली और भौंरा
(घ) सखी और भौंरा

(49) जगत्-जगत [2015]
(क) संसार और कुएँ का चबूतरा
(ख) संसार और संसारी
(ग) कुआँ और संसार
(घ) घड़ा और पानी

(50) उपल-उत्पल– [2015]
(क) उत्पन्न और ऊपर
(ख) ऊपर और नीचे
(ग) ओला और कमल
(घ) समाप्त और प्रारम्भ

(51) भव-भव्य (2015)
(क) संसार और सुन्दर
(ख) विश्व और व्यापक
(ग) सुख और दुःख
(घ) भौतिक और आध्यात्मिक

(52) कर्म-क्रम [2015]
(क) धर्म और कर्म
(ख) काम और आरम्भ
(ग) कार्य और क्रम
(घ) काम और सिलसिला

(53) आमरण-आभरण– [2013,15]
(क) मृत्यू और आभार
(ख) मृत्यु के निकट और सुन्दर
(ग) मृत्युपर्यन्त और आभूषण
(घ) मृत्यु होना और ढकना

(54) अपत्य-अपथ्य (2016)
(क) पतिविहीन और कुमार्ग
(ख) पुत्रहीन और भोजन
(ग) सन्तान और अहितकर
(घ) पुत्र और बीमारी

(55) कपिश-कपीश [2016]
(क) मटमैला और अंगद
(ख) मटमैला और हनुमान
(ग) बालि और अंगद
(घ) हनुमान और मैला

(56) प्रथा-पृथा– [2016]
(क) तरीका और परम्परा
(ख) अर्जुन और कुन्ती
(ग) रीति-रिवाज और कुन्ती
(घ) परम्परा और पृथ्वी

(57) अनुभव-अनुभूति [2018]
(क) व्यवहार रहित ज्ञान और अव्यावहारिक ज्ञान
(ख) व्यवहार से प्राप्त आन्तरिक ज्ञान और चिन्तन से प्राप्त आन्तरिक ज्ञान ।
(ग) अल्पकालिक ज्ञान और दीर्घकालिक प्राप्त ज्ञान
(घ) व्यावहारिक ज्ञान ओर अव्यावहारिक ज्ञान

(58) ईष्र्या-स्पर्धा [2018]
(क) दूसरों की उन्नति से प्रसन्न होना और दूसरों से प्रेरणा लेना
(ख) दूसरों से द्वेष करना और दूसरों से प्रेम करना
(ग) दूसरों की उन्नति से जलना और दूसरों की उन्नति और गुणों को प्राप्त करने की होड़
(घ) अवनति और उन्नति

(59) अशक्त-आसक्त– [2018]
(क) शक्तिमान-निकट
(ख) समर्थ-लगाव रखने वाला।
(ग) असमर्थ-लगाव रखने वाला
(घ) शक्तिरहित-प्रेम करने वाला

(60) देव-दैव [2018]
(क) देना-आकाश
(ख) देवता-भाग्य
(ग) दाता-विधाता
(घ) दान-भाग्य

(61) अपेक्षा-उपेक्षा [2018]
(क) तुलना और अवहेलना
(ख) समीक्षा और तुलना
(ग) तुलना और स्वागत
(घ) स्वागत और अनादर

(62) कुल-कूल [2018]
(क) वंश और तट
(ख) योग और वियोग
(ग) वंश और योग
(घ) योग और किनारा

उत्तर
1, (ख), 2. (ग), 3. (घ), 4. (क), 5. (क). 6. (ख). 7. (ग), 8. (ग), 9, (ख). 10. (क), 11. (ख), 12, (ख), 13. (क), 14. (क), 15, (ख), 16. (ग), 17. 19. (ग), 20. (ख), 21. (ग), 22, (घ), 23. (क), 24. (क), 25. (ग), 26. (घ), 27. (क), 28. (क), 29. (ख), 30. (ग),31. (क), 32. (क),33. (ग), 34. (घ), 35.(क), 36. (ख),37. (ग), 38. (ख),39. (ख),40. (क),41. (ग),42. (क),43. (ग),44. (क),45. (घ),46. (घ), 47, (घ), 48. (क),49. (क), 50. (ग),51. (क), 52. (घ),53. (ग),54. (ग), 55. (ख), 56. (ग), 57. (ख), 58. (ग), 59. (घ), 60. (ख), 61. (क), 62. (क)

शब्द युग्म प्रश्न (ख)
निम्नलिखित में से किन्हीं दो शब्द-युग्मों के सूक्ष्म अन्तर को स्पष्ट कीजिए-
(i) अविराम-अभिराम,
(ii) अवलम्ब-अविलम्ब,
(iii) ग्रह-गृह,
(iv) कुल-कूल,
(v) अभिज्ञ-अनभिज्ञ,
(vi) क्षात्र-छात्र,
(vii) पुरुष-परुष।
उत्तर
(i) अविराम-अभिराम का अर्थ है–निरन्तर-सुन्दर,
(ii) अवलम्ब-अविलम्ब का अर्थ है-सहाराशीघ्र,
(iii) ग्रह-गृह का अर्थ है-नक्षत्र-घर,
(iv) कुल-कूल का अर्थ है-वंश-किनारा,
(v) अभिज्ञ-अनभिज्ञ का अर्थ है—जानकार-अनजान,
(vi) क्षात्र-छात्र का अर्थ हैं–क्षत्रिय-विद्यार्थी,
(vii) पुरुष-परुष का अर्थ है—मनुष्य-कठोर।

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