Chapter 1 माहेश्वर-सूत्र एवं वर्गों का उच्चारण (व्याकरण)

भाषा- भाषा द्वारा हम अपने विचारों को दूसरों तक पहुँचाते हैं तथा दूसरों के भावों को ग्रहण करते हैं। भाषा में अनेक ध्वनियाँ होती हैं। ध्वनियों को प्रकट करने वाले प्रतीकों को वर्ण कहा जाता है। दो या दो से अधिक वर्ण मिलकर शब्द-रचना करते हैं तथा अनेक शब्दों से मिलकर वाक्य बनते हैं। और अनेक वाक्यों द्वारा भाषा का निर्माण होता है। भाषा का प्रवाह सदैव नदी के समान स्वच्छन्द होता है। व्याकरण इसमें किनारों का काम करता है। भाषा को देखकर ही व्याकरण के नियम बनाये जाते हैं; अर्थात् भाषा पहले होती है और व्याकरण उसके बाद। संस्कृत भाषा का व्याकरण बहुत वैज्ञानिक है। इसके नियमों को बड़ी सरलता से समझा जा सकता है। संस्कृत भाषा के समस्त व्याकरण एवं वर्णमाला का आधार महर्षि पाणिनि द्वारा प्रतिपादित चौदह सूत्र हैं, जिन्हें ‘शिव सूत्र’ अथवा ‘माहेश्वर सूत्र’ भी कहते हैं।

संस्कृत  की वर्णमाला

कोई भी वर्णमाला विभिन्न प्रकार के वर्षों से बनती है और वर्ण विभिन्न प्रकार की ध्वनियों को प्रकट करने वाले प्रतीक होते हैं। संस्कृत वर्णमाला के वर्ण मुख्य रूप से दो प्रकार के होते हैं-(अ) स्वर या अच् तथा (ब) व्यंजन या हल्।।

(अ) स्वर या अच्- जिसका उच्चारण किसी अन्य ध्वनि की सहायता के बिना होता है और मुँह से श्वास-वायु बिना किसी रुकावट के बाहर निकल जाती है, उसे स्वर या अच् कहते हैं; जैसे-अ, इ, उ आदि।

स्वर वर्णो को तीन भागों में विभक्त किया गया है

  1. ह्रस्व स्वर- इनके उच्चारण में कम समय लगता है। इनके उच्चारण-समय को एक मात्रा माना गया है; जैसे-अ, इ, उ, ऋ, लु।
  2. दीर्घ स्वर- इनके उच्चारण में ह्रस्व स्वरों से दुगुना समय लगता है। इसीलिए इनके उच्चारण-समय को दो मात्रा माना गया है; जैसे—आ, ई, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ, औ। 
  3. प्लुत् स्वर- इनके उच्चारण में सबसे अधिक समय लगता है। इसीलिए इनके उच्चारण समय को तीन मात्रा का माना गया है; ऐसे वर्गों के सम्मुख ३ लिख देते हैं; जैसे-ओ३म्। इन स्वरों का प्रयोग सामान्य संस्कृत में नहीं मिलता है।

(ब) व्यंजन या हल्- जिन वर्गों का उच्चारण स्वर की सहायता के बिना नहीं हो सकता और श्वास-वायु किसी-न-किसी अवरोध के बाद ही मुँह से बाहर निकलती है, उन्हें व्यंजन कहते हैं; जैसे—क, ख आदि। व्यंजनों के उच्चारण की सरलता के लिए उनमें ‘अ’ मिला रहता है; जैसे—क् + अ = क। व्यंजन वर्गों को भी तीन भागों में विभक्त किया गया है

1.स्पर्श व्यंजन- जिन वर्गों के उच्चारण के समय मुख के दो अवयव एक-दूसरे का स्पर्श करते हैं और श्वास-वायु के निकलने में बाधा डालते हैं, उन्हें स्पर्श व्यंजन कहा जाता है। ये संख्या में 25 होते हैं, जिनका वर्गानुसार विभाजन इस प्रकार है


2.अन्तःस्थ-
जो वर्ण न तो पूरी तरह स्वर होते हैं और न व्यंजन; अर्थात् दोनों के बीच (अन्तः) में स्थित होते हैं, उन्हें अन्त:स्थ वर्ण कहा जाता है। ये चार हैं

अन्तःस्थ- य र ल व

3. ऊष्म- जिन वर्गों का उच्चारण करते समय मुख से निकलने वाली वायु ऊष्म (घर्षण के कारण) होकर बाहर निकलती है, उन्हें ऊष्म वर्ण कहा जाता है। ये भी संख्या में चार हैं

ऊष्मा – श ष स है।

विशेष-

  1. उपर्युक्त के अतिरिक्त विसर्ग (:) व (अनुस्वार) (‘) भी अन्य ध्वनियाँ हैं।
  2. अ, ए तथा ओ स्वर वर्गों को गुण कहते हैं; जब कि ओ, ऐ, औ को वृद्धि कहते हैं।

उच्चारण-स्थान

वर्गों का उच्चारण करते समय मुख का कोई-न-कोई भाग विशेष भूमिका निभाता है। वर्ण के उच्चारण में जिस भाग की विशेष भूमिका होती है, वही उसका उच्चारण-स्थान कहलाता है। इन उच्चारण-स्थानों के आधार पर वर्गों का नामकरण भी किया गया है। वर्गों के उच्चारण-स्थान क्रमशः इस प्रकार हैं
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प्रयत्न

वर्गों का उच्चारण करते समय मुख के विभिन्न भाग कुछ चेष्टाएँ करते हैं। इन भागों के उच्चारण करने की चेष्टा को ही प्रयत्न कहते हैं। उच्चारण में कुछ चेष्टाएँ मुख के अन्दर के भागों में होती हैं तथा कुछ बाहर के भागों में होती हैं। मुख के अन्दर होने वाली चेष्टाओं को आभ्यन्तर प्रयत्न तथा बाहर होने वाली चेष्टाओं को बाह्य प्रयत्न कहते हैं। आभ्यन्तर प्रयत्न निम्नलिखित पाँच प्रकार के होते हैं

(1) स्पृष्ट- इस प्रयत्न में जिह्वा मुख के विभिन्न भागों को स्पर्श करती है। इसलिए ही इन्वर्गों को स्पर्श वर्ण भी कहते हैं। इसके अन्तर्गत ‘क’ से ‘म’ तक के वर्ण आते हैं। 

(2) ईषत् स्पृष्ट– इस प्रयत्न में जिह्वा मुख के विभिन्न भागों का स्पृष्ट वर्गों की अपेक्षा कम स्पर्श करती है। इसके अन्तर्गत ‘य’, ‘र’, ‘ल’, ‘व वर्ण आते हैं।

(3) विवृत- इस प्रयत्न द्वारा स्वर वर्गों का उच्चारण होता है। इस प्रयत्न में मुख को खोलना पड़ता है।

(4) ईषत् विवृत- इस प्रयत्न में जिह्वा को अपेक्षाकृत कम उठाना पड़ता है। इसके अन्तर्गत ‘श’, ‘ष’, ‘स’, ‘ह’ वर्ण आते हैं।

(5) संवृत- इसमें वायु का मार्ग बन्द हो जाता है। यह प्रयत्न केवल ह्रस्व ‘अ’ के लिए होता है। बाह्य प्रयत्नों में ओष्ठों की चेष्टाएँ तथा उच्चारण के समय बनने वाली मुखाकृतियाँ आती हैं।

माहेश्वर-सूत्र

महर्षि पाणिनि ने संस्कृत के सभी वर्गों को लेकर लघु सूत्रों द्वारा विस्तृत अर्थ वाले नियमों का निर्माण किया है। ये लघु सूत्र चौदह हैं, जिन्हें शिव-सूत्र अथवा माहेश्वर-सूत्र भी कहते हैं।

  1. अइंउण्,
  2. ऋलुक्,
  3.  एओङ,
  4. ऐऔच्,
  5. हयवरट्,
  6. लणे,
  7. अमरूणनम्,
  8. झभञ्,
  9. घढधष्,
  10. जबगडदश्,
  11. खफछठथचटतव्,
  12. कपय्,
  13. शषसर्,
  14. हल्।

इन सूत्रों के प्रत्याहार बनाते समय प्रत्येक सूत्र का अन्तिम (हलन्त) अक्षर लुप्त हो जाता है। इनमें आरम्भ के चार सूत्रों में स्वर वर्ण हैं तथा शेष दस सूत्रों में व्यंजन वर्ण। 

चौहद शिव- सूत्रों से प्रत्याहारों का निर्माण किया जाता है। महर्षि पाणिनि के अनुसार “वह संक्षिप्त रूप जो ‘किसी सूत्र के प्रथम और अन्तिम वर्गों को जोड़कर बनाया जाता है, प्रत्याहार कहलाता है। जैसे-अइउण सूत्र का प्रत्याहार अण। जो प्रत्याहार बनाना हो, उसका प्रथम वर्ण लेकर और शिव-सूत्रों का अन्तिम हलन्त वर्ण निकालकर प्रत्याहार बनता है, अर्थात् प्रथम वर्णसहित अन्तिम वर्ण से पूर्व के सभी वर्ण उस प्रत्याहार के अन्तर्गत आ जाते हैं। इसमें हलन्त वर्गों को छोड़ दिया जाता है। कुछ प्रमुख प्रत्याहारों का विवरण निम्नलिखित है

  1.  इक्–इ, उ, ऋ, लू ( ‘अइउण्’ के ‘इ’ से ऋलुक्’ के ‘क’ के पूर्व के वर्ण)
  2. यण–य, व, र, ल ( ‘हयवर’ के ‘य’ से ‘लण’ के ‘ण के पूर्व के वर्ण)
  3. अक्-अ, इ, उ, ऋ, लू ( ‘अइउण्’ के ‘अ’ से ऋलुक्’ के ‘क’ के पूर्व के वर्ण)
  4. अच्-अ, इ, उ, ऋ, लु, ए, ओ, ऐ, औ ( ‘अइउण्’ के ‘अ’ से ‘ऐऔच्’ के ‘च्’ के पूर्व के वर्ण)
  5. एङ–ए, ओ ( ‘एओङ ‘ए’ से ‘ङ’ के पूर्व के वर्ण)
  6. एच् ए, ओ, ऐ, औ ( ‘एओङ’ के ‘ए’ से ‘ऐऔच्’ के ‘च्’ के पूर्व के वर्ण) |
  7. झल्-झ, भ, घ, ढ, ध (वर्ग का चतुर्थ वर्ण), ज ब ग ड द (वर्ग का तृतीय वर्ण), ख, फ, छ, ठ, थे (वर्ग को द्वितीय वर्ण), च, ट, त, क, प (वर्ग का प्रथम वर्ण), श, ष, स, ह (ऊष्म वर्ण) = 24 वर्ण ( ‘झेभञ्’ में ‘झ’ से ‘हल्’ के ‘ल्’ तक के वर्ण)
  8. जश्-ज, ब, ग, ड, द (वर्ग का तृतीय वर्ग-जबगडदश्’ में ‘ज’ से ‘श्’ के पूर्व के वर्ण)
  9. हश्–ह, य, व, र, ल, ञ, म, ङ, ण, न, झ, भ, घ, ढ, ध, ज, ब, ग, ड, द (वर्गों के तृतीय, चतुर्थ, पञ्चम वर्ण और य, र, ल, व)। ‘हश्’ को कोमल व्यंजन भी कहते हैं। |
  10. खर्-ख, फ, छ, ठ, थ, च, ट, त, क, प, श, ष, स (वर्गों के प्रथम, द्वितीय वर्ण तथा श, ष, स)। ‘खर्’ प्रत्याहार को कठोर व्यंजन भी कहते हैं। | पाणिनि के चौदह सूत्रों से अनेक प्रत्याहार बन सकते हैं, परन्तु पाणिनि ने मात्र 42 प्रत्याहारों का प्रयोग अपने व्याकरण में किया है। ये 42 प्रत्याहार पाणिनीय व्याकरण के सार माने जाते हैं। अकारादि क्रम से ये निम्नलिखित हैं
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विशेष— प्रत्याहारों के निर्माण के लिए चौदह माहेश्वर सूत्रों को क्रम से शुद्ध रूप में स्मरण रखना आवश्यक है, अन्यथा प्रत्याहार शुद्ध रूप से नहीं लिखे जा सकेंगे। जिस प्रत्याहार के वर्षों को लिखना हो उसका प्रथम वर्ण चौदह सूत्रों में से छाँटिए और अन्तिम (हलन्त) वर्ण तक चले जाइए  जब वह मिल जाए तो उसके मध्य के सभी वर्गों को लिख लीजिए। ये वर्ण ही उस प्रत्याहार के वर्ण होंगे।

लघु-उत्तरीय प्रश्‍नोत्तर संस्कृत व्याकरण से।

प्रश्‍न 1- निम्नलिखित प्रश्न के उत्तर दीजिए
(अ)
च का उच्चारण-स्थान बताइए।
उत्तर
च का उच्चारण-स्थान तालु है।

(आ)
कण्ठ से किन वर्गों का उच्चारण होता है?
उत्तर
कण्ठ से अ, क, ख, ग, घ, ङ, ह तथा विसर्ग का उच्चारण होता है।

(इ)
य, र, ल, व को किस नाम से पुकारते हैं?
उत्तर
य, र, ल, व को अन्त:स्थ नामों से पुकारते हैं।

(ई)
तालु से किन-किन वर्गों का उच्चारण होता है?
उत्तर
तालु से इ, च, छ, ज, झ, ञ, य और श वर्गों का उच्चारण होता है।

(उ)
त और थ का उच्चारण किस स्थान से होता है?
उत्तर
त और थे का उच्चारण दन्त से होता है।

(ऊ)
श का उच्चारण किस वर्ग के उच्चारण से मिलता है?
उत्तर
श का उच्चारण चवर्ग के उच्चारण से मिलता है।

(ऋ)
ष का उच्चारण स्थान बताइए।
उत्तर
ष का उच्चारण-स्थान मूद्ध है।

(ए)
स का उच्चारण स्थान बताइए।
उत्तर
स का उच्चारण-स्थान दन्त है।।

प्रश्‍न 2- निम्नलिखित कथनों में सही कथन पर ‘✓’ तथा गलत कथन पर ‘✗’ का निशान लगाइए

(क) अ और क का उच्चारण-स्थान एक नहीं है। (✗)
(ख) ल और स को उच्चारण दाँतों के सहारे होता है। (✓)
(ग) इ और य का उच्चारण-स्थान एक है। (✓)
(घ) उ और व का उच्चारण-स्थान एक नहीं है। (✓)
(ङ) मूद्ध से उच्चरित होने वाले वर्षों में ठ, ड और र हैं। (✓)

प्रश्‍न– 3–अधोलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए
(क)
जश् प्रत्याहार के अन्तर्गत आने वाले वर्ण बताइए।
उत्तर
जश् प्रत्याहार के अन्तर्गत आने वाले वर्ण ज, ब, ग, ड, द हैं।

(ख)
इक् से क्या समझते हैं?
उत्तर
इक् प्रत्याहार का तात्पर्य इ, उ, ऋ, लु वर्गों के समूह से है।

(ग)
ए और एच् में अन्तर बताइए।
उत्तर
एङ प्रत्याहार के अन्तर्गत ए, ओ वर्ण हैं, जब कि एच् प्रत्याहार के अन्तर्गत ए, ऐ, ओ, औ वर्ण आते हैं।

(घ)
स्पर्श किन वर्गों को कहते हैं और क्यों?
उत्तर
क से म तक के समस्त वर्गों को स्पर्श वर्ण कहते हैं; क्योंकि इनके उच्चारण में जिह्वा विभिन्न उच्चारण-स्थानों का स्पर्श करती है।

(ङ)
वर्गों के तीसरे वर्ण किस प्रत्याहार में आते हैं?
उत्तर
वर्गों के तीसरे वर्ण जश् प्रत्याहार में आते हैं।

(च)
नासिका के सहारे किन वर्गों का उच्चारण होता है?
उत्तर
नासिका के सहारे ङ, ञ, ण, न, म वर्गों का उच्चारण होता है।

(छ)
पवर्ग से आप क्या समझते हैं?
उत्तर
पवर्ग से आशय प, फ, ब, भ, म वर्गों के समूह से है।

(ज)
किस प्रत्याहार में सभी स्वर आते हैं?
उत्तर
अच् प्रत्याहार में सभी स्वर आते हैं।

(झ)
गुण किसे कहते हैं?
उत्तर
अ, ए, ओ वर्गों को गुण कहते हैं।

(ञ)
वृद्धि में कौन-कौन-से वर्ण आते हैं?
उत्तर
वृद्धि में आ, ऐ, औ वर्ण आते हैं।

प्रश्‍न  4- निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए

(क)
प्रयत्न किसे कहते हैं?
उत्तर
वर्गों का उच्चारण करने के लिए मुख के अंगों द्वारा की गयी चेष्टाएँ ही प्रयत्न कहलाती

(ख)
आभ्यन्तर प्रयत्न कितने प्रकार का होता है?
उत्तर
आभ्यन्तर प्रयत्न पाँच प्रकार का होता है स्पृष्ट, ईषत् स्पृष्ट, विवृत, ईषत् विवृत और संवृत।

(ग)
स्वरों के उच्चारण में कौन-सा प्रयत्न होता है?
उत्तर
स्वरों के उच्चारण में विवृत प्रयत्न होता है।

(घ)
स्पृष्ट प्रयत्न में कौन-कौन से वर्ण आते हैं?
उत्तर
स्पृष्ट प्रयत्न में क से में तक के समस्त वर्ण आते हैं।

(ङ)
उ और य के उच्चारण में क्या असमानता है?
उत्तर
उ का उच्चारण-स्थान ओष्ठ तथा प्रयत्न विवृत है, जब कि य का उच्चारण-स्थान तालु और प्रयत्न ईषत् स्पष्ट है।

वरित प्रश्‍नत्तर

अधोलिखित प्रश्नों में प्रत्येक प्रश्‍न के उत्तर रूप में चार विकल्प दिये गये हैं। इनमें से एक विकल्प शुद्ध है। शुद्ध विकल्प का चयन कर अपनी उत्तर-पुस्तिका में लिखिए

1. कौन-से वर्ण स्वर वर्ण कहलाते हैं?
(क) जो श्वास वायु के मार्ग में बिना बाधा डाले उच्चरित होते हैं।
(ख) जो श्वास वायु के मार्ग में बाधा डालकर उच्चरित होते हैं।
(ग) जो हलन्त से युक्त होते हैं।
(घ) जो दूसरे वर्गों की सहायता से उच्चरित होते हैं।

2. किन स्वरों के उच्चारण में एक मात्रा का समय लगता है?
(क) ह्रस्व
(ख) दीर्घ
(ग) प्लुत ।
(घ) अन्त:स्थ

3. किन स्वरों के उच्चारण में दो मात्रा का समय लगता है?
(क) अन्त:स्थ
(ख) दीर्घ
(ग) प्लुत
(घ) ह्रस्व

4. प्लुत स्वरों के सामने क्या लिखा जाता है? |
(क) २
(ख) दो
(ग) ३
(घ) तीन

5. ‘य’ वर्ण का उच्चारण-स्थान कौन-सा है?
(क) मूद्ध
(ख) कण्ठ ।
(ग) दन्त
(घ) तालु

6. ‘फ’ वर्ण का उच्चारण-स्थान कौन-सा है?
(क) दन्तौष्ठ
(ख) ओष्ठ ।
(ग) जिह्वामूल
(घ) कण्ठौष्ठ

7. ‘ऐ’ वर्ण का उच्चारण-स्थान कौन-सा है?
(क) मूद्ध
(ख) दन्त ।
(ग) कण्ठ-तालु

(घ) तालु।

8. ‘लू’ वर्ण का उच्चारण-स्थान कौन-सा है?
(क) कण्ठौष्ठ
(ख) कण्ठ-तालु
(ग) दन्त
(घ) दन्तौष्ठ

9. विसर्ग’:’ का उच्चारण-स्थान क्या माना जाता है? ”
(क) कण्ठ

(ख) नासिका
(ग) दन्तौष्ठ
(घ) ओष्ठ 

10. ‘कण्ठ-तालु’ से उच्चरित होने वाले कौन-से वर्ण हैं?
(क) ए, ऐ
(ख) उ, ऊ
(ग) इ, ई
(घ) ओ, औ,

11. अनुस्वार( ) का उच्चारण-स्थान क्या माना जाता है?
(क) नासिका
(ख) जिह्वामूल
(ग) दन्तौष्ठ
(घ) तालु

12. ‘ऋ’ वर्ण का उच्चारण-स्थान कौन-सा है?
(क) दन्त
(ख) कण्ठ
(ग) मूद्ध
(घ) तालु

13. ‘व’ वर्ण का उच्चारण-स्थान कौन-सा है?
(क) कण्ठौष्ठ
(ख) जिह्वामूल
(ग) कण्ठ-तालु।
(घ) दन्तौष्ठ

14. स्पर्श व्यंजन वर्गों के अन्तर्गत कुल कितने वर्ण आते हैं?
(क) पन्द्रह
(ख) पचीस
(ग) पाँच
(घ) पैंतीस

15. ‘ह’ वर्ण के लिए कौन-सा आभ्यन्तर प्रयत्न है?
(क) विवृत
(ख) ईषत् विवृत ।
(ग) स्पृष्ट
(घ) ईषत् स्पृष्ट

16. ‘य’ वर्ण के लिए कौन-सा अभ्यन्तर प्रयत्न है?
(क) ईषत् स्पृष्ट
(ख) विवृत
(ग) स्पृष्ट
(घ) ईषत् विवृत

17. यण् प्रत्याहार में कौन-कौन से वर्ण आते हैं?
(क) ज, ब, ग, ड, द
(ख) ह, य, व, र, ल
(ग) य, व, र, ल ।
(घ) श, ष, स, ह

18. अम् प्रत्याहार में कौन-कौन से वर्ण आते हैं?
(क) ञ, म, ग, ण ।
(ख) ङ, म, ण, न, ग
(ग) ङ, में, ण, न .,
(घ) ञ, म, ङ, ण, ने।

19. अक् प्रत्याहार में कौन-कौन-से वेर्ण आते हैं?
(क) अ, इ, उ
(ख) अ, इ, उ, ऋ
(ग) अ, इ, उ, ऋ, लु, ए, ओ ।
(घ) अ, इ, उ, ऋ, लु।

20. झष प्रत्याहार में कौन-कौन-से वर्ण आते हैं?
(क) झ, भ, घ, ढ,ध ।
(ख) झ, भ, धे, ढ
(ग) झ, भ, घ, ढे,
(घ) झ, भ, ज ।

21. ‘ज, ब, ग, ड, द’ वर्गों का प्रत्याहार कौन-सा है? |
(क) जब्
(ख) जश्
(ग) जर्
(घ) जय्

22. ‘च, ट, त, क, प, श, ष, स’ वर्गों का प्रत्याहार कौन-सा है? ।
(क) चय्
(ख) चल्
(ग) चट्
(घ) चर्

23. ‘श, ष, स’ वर्गों को प्रत्याहार कौन-सा है?
(क) जश्
(ख) शर्
(ग) शल्
(घ) हल्

24. ‘इ, उ, ऋ, लु’ वर्गों का प्रत्याहार कौन-सा है?
(क) अच्
(ख) अण्
(ग) अक्
(घ) इक्

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