Chapter 1 वन्दना

श्लोकों का ससन्दर्भ अनुवाद

(1) विश्वानि ……………………. आसुव।

[ विश्वानि = सम्पूर्ण देव सवितर् = हे सूर्यदेव! दुरितानि = पापों को परासुव= दूर करो, नष्ट करो। यद् (यत्) = जो कुछ। भद्रं = कल्याणकारी (हो)। तन्नः (तत् + नः) = वह हमें। आसुव = प्रदान करो।]

सन्दर्भ – प्रस्तुत वैदिक मन्त्र हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत दिग्दर्शिका’ के ‘वन्दना’ नामक पाठ से अवतरित
अनुवाद – हे सूर्यदेव! हमारे समस्त पापों को नष्ट करो (और) जो कल्याणकारी हो, वह हमें प्रदान करो।

(2) ईशावास्यमिदं …………………. धनम्

[ ईशा = ईश्वर से। वास्यम् = व्याप्त है। इदम् – यह। यत् किञ्च= जो कुछ भी। जगत्यां = अखिल ब्रह्माण्ड में। जगत्-जड़-चेतनरूप जगत्। त्यक्तेन = त्यागपूर्वक। भुञ्जीथाः = (इसे) भोगते रहो। मा गृधः = (इसमें) आसक्त मत होओ (मा = मत, नहीं)। कस्य स्विद् – किसका हैं ? (अर्थात किसी का नहीं)।]

सन्दर्भ – पूर्ववत्।।
अनुवाद – इस अखिल ब्रह्माण्ड में (स्थित) जो यह चराचर जगत् है, वह सब ईश्वर से व्याप्त है, (इसलिए) उस ईश्वर को साथ रखते हुए (उसका सदा-सर्वदा स्मरण करते हुए) त्यागपूर्वक (इसे) भोगो, (इसमें) आसक्त मत होओ, (क्योंकि) धन (भोग्य पदार्थ) किसका है (अर्थात् किसी का भी नहीं है) ? [ अथवा, किसी के भी (कस्य स्वित्) धन पर (धनम्) ललचाओ मत—किसी के धन को मत ग्रहण करो (मा गृधः)।]
विशेष – आशय यह है कि सांसारिक पदार्थ नाशवान् हैं, इसलिए उनमें आसक्त न होकर ईश्वर का सदा स्मरण करते हुए त्यागपूर्वक उनका भोग करो।

(3) सह नाववतु ………………………… विद्विषावहै।

[ सह = साथ-साथ। नाववतु (नौ + अवतु) = ईश्वर हम दोनों (गुरु-शिष्य) की रक्षा करें। भुनक्तु – पालन करें। वीर्यम = शक्ति को करवावहै – (हम दोनो) प्राप्त करें। तेजस्वि- तेजोमयी। नौ – हम दोनों की। अधीतम-पढ़ी हुई विद्या! अस्त-हो। मा विद्विषावहे = हम दोनों परस्पर द्वेष न करें।]

सन्दर्भ – हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत दिग्दर्शिका के ‘वन्दना’ नामक पाठ से अवतरित कठोपनिषद् (शान्तिपाठ) के इस मन्त्र में, ईश्वर से गुरु-शिष्य के कल्याणार्थ प्रार्थना की गयी है।
अनुवाद – हे ईश्वर! आप हम दोनों (गुरु-शिष्य) की साथ-साथ रक्षा करें, साथ-साथ पालन करें, हम दोनों साथ-साथ बल प्राप्त करें, हम दोनों की अध्ययन की हुई विद्या तेजोयुक्त हो (हम कहीं किसी से विद्या में परास्त न हों), हम दोनों परस्पर (कभी) द्वेष न करें।

(4) उत्तिष्ठत ……………………………… वरान्निबोधत।

[ उत्तिष्ठत = उठो। प्राप्य = प्राप्त करो। वरान् = श्रेष्ठ मनुष्यों को। निबोधत = ज्ञान प्राप्त करो। ]

सन्दर्भ – कठोपनिषद् (1/3/14) की यह पंक्ति हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत दिग्दर्शिका’ के ‘वन्दना नामक पाठ से अवतरित है।
अनुवाद – (हे मनुष्यो!) उठो (उद्यम करो), जागो (सावधान रहो), श्रेष्ठ मनुष्यों के समीप जाकर उनसे ज्ञान प्राप्त करो ( श्रेष्ठ अनुभवी विद्वानों के पास जाकर उनसे ज्ञान अर्जित करो)।

(5) यतो यतः …………………………… पशुभ्यः ।

[यतो यतः = जहाँ-जहाँ से। समीहसे= चाहते हो। ततः = वहाँ से। नः = हमें। शन्नः (शं+नः) = हमारा (नः) कल्याण (शं)| प्रजाभ्यः = प्रजाओं (सन्तान) का। पशुभ्यः = पशुओं से (भय के योग में पञ्चमी विभक्ति होती है)।]

सन्दर्भ – हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत दिग्दर्शिका’ के ‘वन्दना’ नामक पाठ से अवतरित यजुर्वेद (36/22) के इस मन्त्र में भगवान् से रक्षा करने की प्रार्थना की गयी है।
अनुवाद – हे प्रभो! तुम जहाँ-जहाँ से उचित समझो (अर्थात् जहाँ-जहाँ से हम पर संकट आने वाला हो) वहाँ से हमें निर्भय करो (अर्थात् हमारी रक्षा करो), हमारी सन्तान का कल्याण करो और हमें पशुओं से निर्भय करो।

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