Chapter 10 भारतवर्षम्

पाठ-सारांश

नामकरण-हमारे देश का नाम भारत है। ‘भरत’ शब्द से ‘भारत’ नाम पड़ा। हमारे देश में ‘भरत’ नाम से चार महापुरुष हुए—
(1) दशरथ के पुत्र राम के छोटे भाई भरत,
(2) हस्तिनापुर के राजा दुष्यन्त और शकुन्तला से उत्पन्न भरत,
(3) नाट्शास्त्र के प्रणेता ‘भरत’ मुनि,
(4) भागवत् पुराण में वर्णित जड़ भरत’। भागवत् के अनुसार जड़ भरत’ के नाम से ही हमारे देश का नाम ‘भारत’ पड़ा। भायाम् (तेजसि) रतत्वादेव भारतम्-इस विग्रह से भी ‘भारत’ नाम सार्थक होता है। मुसलमान शासकों ने ‘सिन्धु नदी के नाम से यहाँ के निवासियों को ‘हिन्दू’ और देश को हिन्दुस्थान’ कहा। यूरोपीय लोग हमारे देश को ‘इण्डिया’ कहते हैं। ।

प्रहरी हिमालय-भारत के उत्तर में पर्वतराज हिमालय स्थित है। संसार के सबसे ऊँचे पर्वत हिमालय की चोटियाँ सदैव बर्फ से ढकी रहती हैं। ऐसा विश्वास किया जाता है कि इसके प्रदेशों में ‘येति’ नाम के हिम मानवे रहते हैं। इसकी उपत्यकाओं में घने वन, असीम ओषधियाँ, फल और फूल तथा अनेक प्रकार के पशु-पक्षी रहते हैं। यह चिरकाल से प्रहरी के समान भारत की रक्षा करता चला आ रही है। चीन के द्वारा हमारे भू-भाग पर कब्जा कर लेने के बाद, हमारे सैनिक रात-दिन इसके हिमाच्छादित शिखरों पर रहकर देश की रक्षा  करते हैं। इसकी गोद में जम्मू-कश्मीर, हिमाचले, सिक्किम, अरुणाचल आदि प्रदेश स्थित हैं। भूटान और नेपाल स्वतन्त्र राज्य भी इसी पर्वत पर स्थित हैं। इसके प्रदेशों पर स्थित अमरनाथ, बदरीनाथ, केदारनाथ, वैष्णव देवी आदि तीर्थों पर प्रतिवर्ष हजारों यात्री जाते हैं। श्रीनगर, पहलगाँव, शिमला, नैनीताल, मसूरी दार्जिलिंग आदि इसी पर्वत पर बसे नगर हैं, जहाँ गर्मियों में लोग पर्यटन के लिए जाते हैं।

तीन दिशाओं में समुद्र-
भारत के दक्षिण में हिन्द महासागर, पूर्व में बंगाल की खाड़ी और पश्चिम में अरब महासागर है। इसके पश्चिमोत्तर भाग में पाकिस्तान और पूर्वोत्तर भाग में ‘बाँग्लादेश है।पहले ये दोनों देश भारत के ही प्रदेश थे। दक्षिण में कन्याकुमारी है, जहाँ तीन समुद्रों का संगम होता है।

तटीय-प्रदेश-कन्याकुमारी के दक्षिण भाग में समुद्र पार हमारी पड़ोसी देश श्रीलंका है। हिन्द महासागर में लक्षद्वीप’ और बंगाल की खाड़ी में ‘अण्डमान भारत के अभिन्न प्रदेश हैं। समुद्र-तट पर गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, आन्ध्र, उड़ीसा, बंगाल आदि भारत के ही प्रदेश हैं। इन नगरों में बड़े बन्दरगाह हैं, जहाँ से असंख्य जलपोतों द्वारा व्यापारिक माल का आयात-निर्यात होता है। सागर के तटों पर मत्स्य-ग्रहण के भी अनेक केन्द्र स्थित हैं।

प्राकृतिक सुषमा–भारत पर प्रकृति देवी की विशेष कृपा है। यहाँ छह ऋतुएँ होती हैं। सूर्य और चन्द्रमा का सर्वाधिक प्रकाश इसी देश में फैलता है। सूर्यास्त और चन्द्रास्त के मनोरम दृश्य भारत में ही देखे जा सकते हैं। इसके उत्तरी भाग में सिन्धु, बेतवा, सतलज, सरस्वती, गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र आदि; इसके मध्य में नर्मदा और चम्बल तथा इसके दक्षिण भाग में गोदावरी, कावेरी, कृष्णा, पेरिषार, महानदी आदि नदियाँ भारतभूमि की उपज बढ़ाती हैं। इन नदियों के तटों पर हरिद्वार, प्रयाग, काशी,गया आदि तीर्थस्थान हैं, जहाँ हजारों यात्री स्नान करके धर्म-लाभ करते हैं। विशेष अवसरों पर कुम्भ । जैसे महामेले लगते हैं। भारत के वन परम मनोहारी हैं, हिमालय पर देवदार के तथा सागर के तटीय : प्रदेशों में नारियल और सुपारी के सुन्दर वन हैं। प्राकृतिक सौन्दर्य के कारण ही कश्मीर को ‘पृथ्वी का स्वर्ग’ कहा जाता है। हमारे राष्ट्रगीत में भी भारत के प्रमुख प्रदेशों, पर्वतों और नदियों का उल्लेख है।

संसार का गुरु-भारत को संसार का गुरु कहा जाता है। यहाँ केवल उपनिषदों और उत्तरवेदान्त की आध्यात्मिकता ही नहीं है, वरन् वेद और स्मृतियों में प्रतिपादित नैतिक आचार तथा योगाभ्यास विदेशियों के आकर्षण के केन्द्र बने हुए हैं। वे भारत के आश्रमों में रहकर शान्ति प्राप्त करते हैं। अपने देशों में भी उन्होंने भारत जैसे आश्रम स्थापित किये हैं। वे काम और अर्थ पुरुषार्थों को भारत की प्राचीन उपलब्धि मानते हैं। वात्स्यायन के यौन-विज्ञान तथा चाणक्य के राजनीति-विज्ञान का उल्लेख किये बिना इतिहास प्रारम्भ नहीं करते। शल्यविज्ञान का आविर्भाव सुश्रुत से ही माना जाता है। गणित के अंकों का लेखन सर्वप्रथम भारत में ही हुआ। बाद में अरब और यूरोपीय देशों ने इसे जाना। आज भी अंकों को ‘हिन्दसा’ (हिन्द से आया हुआ) कहते हैं। ब्रिटेन आदि देशों में आज भी माध्यमिक स्कूलों में योगासनों की शिक्षा दी जाती है। गाँधी जी द्वारा उद्घोषित ‘अहिंसा परमो धर्मः’ व ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना विश्व भर में विश्वशान्ति के अद्वितीय उपाय माने जाते हैं।

कला की प्रगति-भारत की वास्तुकला और शिल्पकला को देखकर विदेशी चकित रह जाते हैं। खजुराहो और कोणार्क के मन्दिरों की शिल्पकला को देखने के लिए सम्पूर्ण विश्व से लाखों पर्यटक यहाँ आते हैं। ताजमहल और कुतुबमीनार आज भी भारत का गौरव बढ़ा रहे हैं। ‘ताजमहल’ को संसार के आश्चर्यों में गिना जाता है। भारतीय मूर्तिकला पर विदेशी इतने मुग्ध हैं कि लाखों रुपये खर्च करके भी वैध-अवैध उपायों से इसे प्राप्त करने का प्रयत्न करते रहते हैं।

महापुरुषों की पवित्र भूमि-इस गरिमाशाली देश भारत में नचिकेता के समान ज्ञानपिपासु, सत्यकाम के समान सत्यवादी, बालक ध्रुव के समान तपस्वी, अभिमन्यु के समान वीर किशोर, एकलव्य-उद्दालक-कौत्स सरीखे गुरुभक्त-शिष्य, शिवि-मयूरध्वज-कर्ण के सदृश परमदानी, हरिश्चन्द्र-युधिष्ठिर के समान सत्यपालक, भरत-लक्ष्मण के समान आदर्श भाई, दशरथ जैसे पिता, मैत्रेयी-गार्गी-भारती के समान विदुषी महिलाएँ, रजिया-दुर्गाबाई-लक्ष्मीबाई के समान वीरांगनाएँ, सीता-सवित्री-गान्धारी के समान सती-स्त्रियाँ, भगत सिंह, चन्द्रशेखर और सुखदेव जैसे देशभक्त, महावीर, बुद्ध और गाँधी जैसे सन्त-महात्मा इस पावनभूमि पर उत्पन्न हुए हैं। दूसरे देशों में तो ईश्वर ने कहीं अपना दूत भेजा तो कहीं पुत्र, परन्तु भारत में तो वे मानव रूप धारण करके स्वयम् अवतीर्ण होते रहे हैं।

राजनीतिक और आर्थिक प्रगति-आज समस्त संसार में भारत का अपना विशिष्ट स्थान है। भारत ने अपनी स्वतन्त्रता प्राप्त करके पराधीन देशों की सहायता करने की घोषणा की। सभी देशों की प्रभुसत्ता का भारत ने सदा समादर किया है। साम्यवादी और पूँजीवादी देशों से अपने को अलग रखकर निर्गुट स्वतन्त्र राष्ट्रों का संगठन किया और गौरांगों की रंगभेद-नीति के विरुद्ध दृढ़ जनमत तैयार किया। आधुनिक विज्ञान, उद्योग और यान्त्रिकी के क्षेत्र में विकास करते हुए इसने अनेक नये आविष्कार किये और कृषि का पर्याप्त उत्पादन बढ़ाया। जिस देश में पहले सूई भी नहीं बनती थी, वहाँ अब आधुनिक यन्त्रों के निर्माण हो रहे हैं। इंग्लैण्ड-अमेरिका जैसे विकसित राष्ट्रों को भी हस्तशिल्प की वस्तुएँ एवं अभियान्त्रिकीय सूक्ष्म यन्त्र प्रदान किये जा रहे हैं। वैज्ञानिकों और इंजीनियरों की जितनी अधिकता भारत में है, उतनी अन्य देशों में नहीं। भारत की परिश्रमशीलता से अन्य देश भी भली-भाँति परिचित

समस्याएँ—यद्यपि भारत का अतीत एवं गौरव सम्मान के उच्च आसन पर प्रतिष्ठित है, किन्तु इससे भारत के भविष्य का निर्माण नहीं हो सकता। वर्तमान में उपलब्ध सुविधाओं और सम्पत्ति का सदुपयोग परमावश्यक है। भारत में कुछ समस्याएँ मुँह फैलाये खड़ी हैं। विदेशी नहीं चाहते कि भारत राजनीतिक और आर्थिक क्षेत्र में प्रगति करे; अतः वे आपस में फूट डालकर झगड़े कराते रहते हैं। विदेशियों द्वारा भड़काने  पर कुछ धर्मान्ध पंजाब में आतंकवाद फैला रहे हैं। प्रतिवर्ष अनेक साम्प्रदायिक झगड़े होते हैं, जिनमें निर्दोष व्यक्ति मारे जाते हैं और जन-धन की भारी क्षति और देश की शक्ति का ह्रास होता है। हमको आपस में मित्रतापूर्वक रहना चाहिए, क्योंकि देश की मुख्यधारा से मिलने में ही देश का कल्याण है। राजनीति द्वारा धर्म का संकट उपस्थित करना देश के लिए अहितकर

हमारे देश में दूसरी बड़ी समस्या जनसंख्या की वृद्धि की है। जनसंख्या की वृद्धि से देश के . विकास की गति रुक जाती है और विकास के अवसर, नष्ट हो जाते हैं; अतः हमें परिवार कल्याण की योजनाओं पर अमल करना चाहिए। हमारे सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार को बोलबाला है। अनुचित लाभ के लिए किसी को प्रोत्साहित नहीं करना चाहिए।

यह हमारी जन्मभूमि है, जिस पर हमने जन्म लिया है। किसी का शव जलाया जाये या दफनाया जाये—दोनों में क्या अन्तर है? सबको भारतमाता की मिट्टी में विलीन होना है। आपस में झगड़ने और जन्मभूमि के प्रति विद्रोह से क्या लाभ? उसका हमें हमेशा सम्मान करना चाहिए। कहा भी गया है-”जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।”

गद्यांशों का सस अनुवाद

(1) भारतं नामास्माकं जन्मभूमिः। भरतनामानश्चत्वारो महापुरुषा अस्मिन् देशे अति प्राचीनकाले.बभूवुः। एको मर्यादापुरुषोत्तमरामचन्द्रस्यानुजो दाशरथिर्भरतः, हस्तिनापुराधीशस्य पुरुवंशीयस्य दुष्यन्तस्य सुतश्शाकुन्तलेयः द्वितीयः, अभिनयकुशलो नाट्यशास्त्रप्रणेता भरतमुनिश्च तृतीयः, श्रीमद्भागवते वर्णितो ब्रह्मस्वरूपो जडभरतश्चतुर्थः। भागवते तत्रैव प्रतिपादितमस्ति ”अजनाभं नामैतद्वर्ष भारतमिति यत् आरभ्य व्यपदिशन्ति” तेनेदं प्रतीयते यद जडभरतस्य नामैव अस्माकं देशस्य संज्ञा अनुसरतीति। वयं तु एवं मन्यामहे यत् सर्वदा सर्वथा च “भायाम् तेजसि रतत्वादेव भारतमिति” अस्माकं प्राणप्रियस्य देशस्य प्राचीनं नाम। कालान्तरे सिन्धुनदीसंज्ञामनुसृत्य मुहम्मदीयैरत्रत्यवासिनो हिन्दुनाम्ना कथिता, देशश्च हिन्दुस्थानमिति। तथैव यूरोपीयैरितरैश्च‘‘इण्डिया” इति नाम कृतम्।

शब्दार्थ-
बभूवुः = हुए।
अनुजः = छोटा भाई।
दाशरथिः भरतः = दशरथ के पुत्र भरत।
सुतश्शाकुन्तलेयः = शकुन्तला का पुत्र।
प्रणेता = रचना करने वाले
प्रतिपादितमस्ति = सिद्ध किया है।
व्यपदिशन्ति = कहते हैं।
प्रतीयते = प्रतीत होता है।
अनुसरति = अनुसरण करता है।
मन्यामहे = मानते हैं।
अनुसृत्य = अनुसरण करके।
यूरोपीयैरितैश्च (यूरोपीयैः + इतरैः + च) = यूरोप के निवासियों ने तथा अन्यों ने। |

सन्दर्थ
प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत गद्य-भारती’ में संकलित ‘भारतवर्षम्’ शीर्षक पाठ से उद्धृत है।

[संकेत-इस पाठ के शेष गद्यांशों के लिए भी यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।] प्रसंग-इस गद्यांश में भारत के ‘भारत’ नामकरण होने का कारण बताया गया है।

अनुवाद
भारत हमारी जन्मभूमि है। अति प्राचीन समय में हमारे देश में ‘भरत’ नाम के चार महापुरुष हुए। एक तो मर्यादापुरुषोत्तम रामचन्द्र के छोटे भाई, दशरथ के पुत्र भरत; दूसरे हस्तिनापुर के राजा, पुरुवंशीय दुष्यन्त के शकुन्तला से उत्पन्न पुत्रं भरते; तीसरे अभिनयकला में कुशल, नाट्यशास्त्र के रचयिता भरतमुनि और चौथे श्रीमद्भागवत् में वर्णित ब्रह्मस्वरूप जड़भरत। भागवत् में वहीं पर बताया गया है-“अज की नाभि से उत्पन्न यह वर्ष भारत, जिसके आरम्भ करके कहते हैं। उससे यह प्रतीत होता है कि जड़भरत के नाम का ही अनुसरण हमारे देश का नाम कर रहा है (अर्थात् हमारे देश का नाम ‘भारत’ जड़भरत के नाम का अनुसरण कर रहा है)। हम तो ऐसा मानते हैं कि सदा और सब प्रकार से तेज (भा) में संलग्न (रत) रहने के कारण ही भारत है, ऐसा प्राणों से प्यारे हमारे देश का प्राचीन नाम है। बाद में सिन्धु नदी के नाम का अनुसरण करके मुसलमानों ने यहाँ के निवासियों को ‘हिन्दू’ नाम से और देश को ‘हिन्दुस्थान’ कहा है। उसी प्रकार यूरोप के निवासियों ने और अन्यों ने ‘इण्डिया’ नाम,रख दिया।

(2) अस्योत्तरस्यां दिशि देवतात्मा हिमालयो नाम नगाधिराजो विराजते। संसारस्य पर्वतेषु उत्तुङ्गतमस्यास्य गिरेरुच्छ्रिताः शिखरमालाः सर्वदैव हिमाच्छादितास्तिष्ठन्ति तस्मादेवायं हिमालयः कथ्यते। एतानि शिखराणि देशीयानां विदेशीयानां च पर्वतारोहिणामाकर्षणकेन्द्राण्यपि वर्तन्ते। एवं विश्वस्यते  यत् तुषाराच्छादितेष्वस्य प्रदेशेषु ‘येति’ इति जातीयाः केचन हिममानवा अपि प्राप्यन्ते। हिमावेष्टितोऽयमद्रिर्भारतस्य मूनि विधिना स्थापितं सितं किरीटमिव विभाति यस्योपत्यकासु प्रसृतानि गहनानि वनानि मरकतमणिपङ्क्तीनां शोभामनुहरन्ति। एषु वनेषु निः सीमा ओषधिसम्पत् पुष्पद्धिश्च भवतः। बहुप्रकाराणि फलानि उत्पद्यन्ते, नानाविधाः।

खगमृगाश्च वसन्ति। एवमनुश्रूयते यदन्तकाले सद्रौपदीकाः पाण्डवी हिमालयमारोहन्त एव स्वर्गमाप्ताः। दीर्घकालं यावदसौ पर्वतः प्रहरीव स्थितो भारतस्य रक्षामकरोत् अद्यत्वे तु अस्य रक्षा भारतेन करणीया आपतिता, यतो हि अस्माकं प्रतिवेशी चीनदेशः कञ्चिद् भूभागं स्वकीयं कृत्वा यदा कदा भारतीयसीम्न उल्लङ्घनं हिमालयस्य पारात् करोति। तदनेकत्रास्माकं शूराः सैन्ययुवानोऽत्युच्छितेषु हिमाच्छादितेषु स्थानेषु दिवानिशं दृढ़ तिष्ठन्तो रक्षन्ति। हिमालयस्यै वोत्सेऽस्माकं गणराज्यस्य जम्मूकश्मीर-हिमालचल-अरुणाचलप्रदेशाः सन्ति। भूताननामकं भारतरक्षितं स्वतन्त्रं राज्यं भारतमित्रं संसारस्यैकमात्रं हिन्दुराष्ट्रं नैपालराज्यं च वर्तते। अमरनाथवैष्णवदेवी-गङ्गोत्री-यमुनोत्री-केदारनाथ-बद्रीनाथादीनि नैकानि सुप्रसिद्धानि तीर्थान्यपि हिमालयस्य क्रोडे विराजन्ते। यत्र देशस्य प्रत्येकं भूभागात् प्रतिवर्षं सहस्रशस्तीर्थयात्रिण आगच्छन्ति। श्रीनगर-पहलगाँव- शिमला-नैनीताल-मसूरी-दार्जिलिङ्गादीनि मनोरमनगराण्यपि अत्रैव वर्तन्ते यत्र बहवो जनाः ग्रीष्मर्तुतापात् अत्रागत्य त्राणं लभन्ते।।

शब्दार्थ-
अस्योत्तरस्यां (अस्य + उत्तरस्याम्) = इसकी उत्तर दिशा में।
नगाधिराजः = पर्वतों का राजा।
उत्तुंगतमस्यास्य = सबसे ऊँची इसकी।
उच्छूिताः = ऊँची।
हिमाच्छादितास्तिष्ठन्ति = बर्फ से ढंकी रहती हैं।
विश्वस्यते = विश्वास किया जाता है।
केचन = कोई।
प्राप्यन्ते = पाये जाते हैं।
अद्रिः = पर्वत।
मूनि = माथे पर।
विधिना = विधाता के द्वारा।
सितम् = श्वेत।
किरीटम् इव = मुकुट के समान।
उपत्यकासु = निचली घाटियों (तलहटियों) में।
प्रसृतानि = फैले हुए।
गहनानि = घने।
मरकतमणिपङ्क्तीनां = मरकत-मणियों की पंक्तियों की।
शोभामनुहरन्ति = शोभा धारण करते हैं।
एवमनुश्रूयते = ऐसा सुना जाता है।
सद्रौपदीकाः = द्रौपदीसहित।
प्रहरीव = पहरेदार के समान।
अद्यत्वे = आजकल।
आपतिता = आ पड़ी है।
प्रतिवेशी = पड़ोसी।
सीम्नः = सीमा का पारात् = पार से।
दिवानिशम् = रात-दिन।
उत्से = गोद में।
क्रोडे = गोद में।
सहस्रशः = हजारों।
ग्रीष्मर्तुतापात् (ग्रीष्मऋतु: + तापात्) = ग्रीष्म ऋतु के ताप से।
त्राणं लभन्ते = रक्षा पाते हैं।

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में भारत की उत्तर दिशा में स्थित हिमालय पर्वत की महिमा और भारत के लिए उसके महत्त्व का वर्णन किया गया है।

अनुवाद
इसकी उत्तर दिशा में देवताओं की आत्मास्वरूप हिमालय नाम का पर्वतों का राजा सुशोभित है। संसार के पर्वतों में सबसे ऊँची इस पर्वत की ऊँची शिखरमालाएँ सदा ही बर्फ से ढकी रहती हैं, इसी कारण से यह ‘हिमालय’ कहा जाता है। ये चोटियाँ देश-विदेश के पर्वतारोहियों के आकर्षण का केन्द्र भी हैं। ऐसा विश्वास किया जाता है कि बर्फ से ढके हुए इसके प्रदेशों में ‘येति जाति के कुछ हिम-मानव भी पाये जाते हैं। बर्फ से ढका हुआ यह पर्वत भारत के मस्तक पर ब्रह्मा के द्वारा रखे गये श्वेत मुकुट के समान सुशोभित हो रहा है, जिसकी तलहटियों में फैले हुए घने वन मरकत मणि की पंक्तियों की शोभा को हरते हैं; अर्थात् वे मरकत मणियों से भी अधिक सुन्दर हैं। इन वनों में सीमारहित औषध-सम्पत्ति और पुष्प-समृद्धि होती है। बहुत प्रकार के फल उत्पन्न होते हैं और  अनेक प्रकार के पशु-पक्षी रहते हैं। ऐसा सुना जाता है कि अन्तिम समय में द्रौपदीसहित पाण्डव हिमालय पर चढ़ते हुए स्वर्ग पहुँच गये। लम्बे समय तक इस पर्वत ने पहरेदार के समान खड़े रहकर भारत की रक्षा की, किन्तु आज इसकी रक्षा भारत को करनी पड़ रही है; क्योंकि हमारा पड़ोसी चीन देश कुछ भू-भाग को दबाकर हिमालय के पार से कभी-कभी भारत की सीमा का उल्लंघन करता है। अनेक जगहों पर हमारे बहादुर सेना के जवान बुहत ऊँचे बर्फ से ढके स्थानों पर रात-दिन मजबूती से खड़े रहकर उसकी रक्षा करते हैं। हिमालय की ही गोद में हमारे गणराज्य के जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश हैं। भूटान नाम का भारतरक्षित स्वतन्त्र राज्य और भारत का मित्र, संसार का एकमात्र हिन्दू राष्ट्र नेपाल राज्य है। अमरनाथ, वैष्णव देवी, गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ, बदरीनाथ आदि अनेक प्रसिद्ध तीर्थस्थान भी हिमालय की गोद में सुशोभित हैं, जहाँ देश के प्रत्येक भूभाग से प्रतिवर्ष हजारों तीर्थयात्री आते हैं। श्रीनगर, पहलगाँव, शिमला, नैनीताल, मसूरी, दार्जिलिंग आदि सुन्दर नगर भी यहीं हैं, जहाँ बहुत-से लोग भयंकर गर्मी से यहाँ आकर छुटकारा पाते हैं।

(3) भारतस्य दक्षिणस्यां दिशि हिन्दमहासागरः, प्राच्यां बङ्गसमुद्रः, प्रतीच्यामरब- सागरश्च वर्तन्ते। पश्चिमोत्तरदिग्भागे सम्प्रति ‘पाकिस्तानः पूर्वोत्तरस्मिश्च ‘बाङ्लादेशः’ तिष्ठति। पूर्वमिमावण्यस्माकं भारतस्यैव भागावस्तां राजनीतिकारणाद् वैदेशिकानां षड्यन्त्राणामस्माकमेव एकस्य वर्गस्य कतिपयनेतृणां हठधर्मितायाश्च कारणात् पार्थक्यं संञ्जातम्। दक्षिणस्यां दिशि भारतस्य दूरतमो भूभागः ‘कन्याकुमारी’ नाम्ना प्रसिद्धो यत्र त्रयाणां सागराणा सङ्गमो भारतस्य चरणप्रक्षालनं कुर्वन्नतिशयपावनतां भजते।।

शब्दार्थ
प्राच्याम् = पूर्व दिशा में।
प्रतीच्याम् = पश्चिम दिशा में।
सम्प्रति = इस समय।
भागावस्ताम् (भागौ + आस्ताम्) = दोनों भाग थे।
पार्थक्यम् = अलगाव।
सञ्जातम् = हो गयी।
सङ्गमः = मिलना।
पावनतां भजते = पवित्रता को प्राप्त करता है।

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में भारत के पूर्व, पश्चिम और दक्षिण में स्थित समुद्रों, स्थानों और देशों का वर्णन है।।

अनुवाद-
भारत की दक्षिण दिशा में हिन्द महासागर, पूर्व दिशा में बङ्ग-समुद्र (बंगाल की खाड़ी) और पश्चिम दिशा में अरब महासागर है। इसकी पश्चिमोत्तर दिशा में अब पाकिस्तान और पूर्वोत्तर दिशा में बांग्लादेश स्थित हैं। पहले ये दोनों (पाकिस्तान और बांग्लादेश) भी हमारे भारत के ही भाग थे, किन्तु राजनीतिक कारणों से, विदेशियों के षड्यन्त्रों से, हमारे ही एक वर्ग के कुछ नेताओं की हठधर्मिता के कारण अलगाव (विभाजन) हो गया। दक्षिण दिशा में भारत का सुन्दर प्रदेश ‘कन्याकुमारी’ नाम से प्रसिद्ध है, जहाँ तीन सागरों का संगम भारत के पद प्रक्षालन करता (पैरों को धोता) हुआ अत्यन्त पवित्र हो जाता है।

(4) पारेसागरं चतुर्योजनमात्रे श्रीलङ्का नामाऽस्माकं प्रतिवेशी देशो विद्यते। एतदपि न जातु विस्मरणीयं यद् हिन्दमहासागरे ‘लक्षद्वीप’ नामा बङ्गसमुद्रे ‘अण्डमान’ नामा द्वीपसमूहश्चापि अस्माकं भारतस्यैव अविच्छिन्नौ प्रदेशौ स्तः। गुर्जर-महाराष्ट्र-कर्णाटक-केरल-तमिल-आन्ध्रउत्कल-बङ्गाज्यानां भूमि सागरः स्पृशति तस्मादेते तटीयप्रदेशाः कथ्यन्ते। यत्र अनेकानि महान्ति पत्तनानि विद्यन्ते येषु असङ्ख्यजलपोतानां साहाय्येन वैदेशिकैर्विनिमेयानां पण्यानां निर्यातमायातं च क्रियेते। प्राचीनकालेऽपि भारतवर्षस्य नौपरिवहनव्यवस्था अतीव समृद्धा आसीत्। अनेकैद्वीपैर्देशान्तरैश्च साकं सागरमार्गेण वाणिज्यं प्रचलति स्म। एवमेव सागरतटीयजलेषु मत्स्यग्रहणव्यापारोऽधुनातनो महानुद्योगः परिणतः।।

शब्दार्थ
पारेसागरम् = सागर के पार। चतुर्योजनमाने = मात्र चार योजन पर। न जातु = कभी नहीं। अविच्छिन्नौ = अभिन्न। कर्णाट = कर्नाटक। उत्कल = उड़ीसा। पत्तनानि = बन्दरगाह (वह स्थान जहाँ जलयान आकर रुकते हैं और विविध सामग्री लेकर विदेशों को जाते हैं)। पण्यानाम् = विक्रेय वस्तुओं का। क्रियेते = किये जाते हैं। अतीव = बहुत अधिक। साकं = साथ। अधुनातनः = आधुनिक। परिणतः = हो गया है। प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश में भारत के समुद्रतटीय प्रदेशों का वर्णन किया गया है।

अनुवाद
समुद्र के पार केवल चार योजन पर श्रीलंका नाम का हमारा पड़ोसी देश है। यह भी कभी नहीं भूलना चाहिए कि हिन्द महासागर में लक्षद्वीप नाम का और बंगाल की खाड़ी में अण्डमान नाम का द्वीपसमूह भी हमारे भारत के ही अभिन्न प्रदेश हैं। गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल, तमिल, आन्ध्र, उड़ीसा और बंगाल राज्यों की भूमि को सागर स्पर्श करता है, इसलिए ये तटीय प्रदेश कहे जाते हैं। यहाँ अनेक बड़े बन्दरगाह हैं, जिनमें असंख्य जलयानों की सहायता से विदेशियों द्वारा विनिमय के योग्य व व्यापारिक वस्तुओं का निर्यात और आयात किया जाता है। प्राचीनकाल में भी भारत की नौका-परिवहन की व्यवस्था अत्यन्त समृद्ध थी। अनेक द्वीपों और दूसरे देशों के साथ सागर के मार्ग से व्यापार चलता था। इसी प्रकार समुद्र के तट के जल में मछली पकड़ने का धन्धा आजकले का महान् उद्योग बन गया है।

(5) प्रकृतिदेव्याः भारते महती कृपा वर्तते। षभिः ऋतुभिर्विरोज़मानम् ऋतुचक्रमत्रैव परिवर्तते। सूर्याचन्द्रमसोः प्रकाशो यथाऽत्र प्रसरति तथा संसारस्यात्यल्पेषु एव देशेषु स्यात्? सूर्यास्तस्य चन्द्रास्तस्य च सूर्यचन्द्रयोः अस्तमनवेलायाः मनोरमाणि दृश्यानि यथा अत्रं भवन्ति तथा नान्यत्र। सकलेऽपि भारते देशे नदीनां प्राकृतिकं जलं प्रसृतं येनात्रत्या भूमिरत्युर्वरा सञ्जाता। सिन्धु-वितस्ता-शतद्-सरस्वती-गङ्गा-यमुना-ब्रह्मपुत्रादयः सरित उत्तरभागे, चर्मण्वती नर्मदादयो मध्यभागे, गोदावरी-कावेरी-कृष्णा-पेरिषार-महा- नद्यादयश्च दक्षिणभागे प्रवहन्ति। एतासां तटेषु हरिद्वार-प्रयाग-काशी-गयादीनि बहूनि तीर्थस्थानानि विद्यन्ते। यत्र प्रतिदिनं सहस्रशो यात्रिणः स्नानं कृत्वा धर्मं चिन्वन्ति। विशेषेष्वसरेषु, तु कुम्भसदृशानि मेलकानि भवन्ति। यत्र देशस्य प्रतिकोणतः सहस्त्रशो लक्षशो जना आगत्य सम्मिलन्ति। देशस्य वास्तविकीमेकतां च वाचं विनैव सुतरां मुखरयन्ति। भारतस्य वनानां शोभापि परमहृद्या। हिमालयेषु देवदारुवृक्षाणामुच्छायो गगनं चुम्बति तर्हि सागरतटीयप्रदेशेषु नारिकेलपूगादिवृक्षाणां घना वनराजयः समुद्रजलमात्मनो दर्पणमिवाकलयन्ति। प्राकृतिकसुषमा

कारणादेव कश्मीरस्तु पृथ्वीस्थः स्वर्ग एवं मन्यते। अस्माकं राष्ट्रगाने भारतस्य प्रमुखानां प्रदेशानां पर्वतानां नीदनाञ्च कीर्तनं वर्तते। अपरस्मिन् च वन्दे मातरमित्याख्ये गते च अस्याः भुवः सुजलत्वं सुफलत्वं शस्यश्यामलत्वञ्च वण्र्यन्ते। |

शब्दार्थ
प्रकृतिदेव्याः = प्रकृति रूपी देवी की।
परिवर्तते = बदलता है।
प्रसरति = फैलता है।
स्यात् = हो सकता है।
नान्यत्र = दूसरी जगह नहीं।
प्रसृतं = बहता है।
अत्युर्वरा = अधिक उपजाऊ।
सञ्जाताः = हो गयी हैं।
वितस्ता = व्यास।
शतद् = सतलज।
चर्मण्वती = चम्बल।
चिन्वन्ति = चुनते हैं, संचय करते हैं।
मेलकानि = मेले।
प्रतिकोणतः = प्रत्येक कोने से।
लक्षशः = लाखों
वाचं विनैव = बिना कहे ही।
सुतरां = भली प्रकार।
मुखरयन्ति = मुखर होते हैं, बोलते हैं।
हृद्या = सुन्दर।
चुम्बति = चूमती है।
पुगादि = सुपाड़ी आदि।
दर्पणामिवाकलयन्ति = दर्पण-सा प्रकट करते हैं।
पृथ्वीस्थः = पृथ्वी पर स्थित।
अपरस्मिन् = दूसरे में।
शस्य = फसल।
वण्र्यन्ते = वर्णित किये जाते

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में भारत के प्राकृतिक सौन्दर्य का वर्णन किया गया है।

अनुवाद
भारत पर प्रकृति देवी की महान् कृपा है। छह ऋतुओं से सुशोभित ऋतु-चक्र यहीं  पर बदलता है। सूर्य और चन्द्रमा का प्रकाश जैसा यहाँ फैलता है, वैसा संसार के बहुत थोड़े ही देशों में होता है। सूर्यास्त, चन्द्रास्त और सूर्य-चन्द्र के डूबने के समय के जैसे सुन्दर दृश्य यहाँ होते हैं, वैसे अन्यत्र नहीं। सारे ही भारत देश में नदियों का प्राकृतिक जाल फैला हुआ है, जिससे यहाँ की भूमि अत्यधिक उपजाऊ हो गयी है। उत्तर भाग में सिन्धु, बेतवा, सतलज, सरस्वती, गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र आदि नदियाँ; मध्य भाग में चम्बल, नर्मदा आदि और दक्षिण भाग में गोदावरी, कृष्णा, कावेरी, पेरिषार आदि महानदियाँ बहती हैं। इनके तटों पर हरिद्वार, प्रयाग, काशी, गया आदि बहुत-से तीर्थस्थान विद्यमान हैं, जहाँ प्रतिदिन हजारों यात्री स्नान करके धार्मिक कार्यक्रमों में लगते हैं (धर्मार्जन करते हैं)। विशेष अवसरों पर तो कुम्भ जैसे (विशाल) मेले होते हैं, जहाँ देश के प्रत्येक कोने से हजारों, लाखों लोग आकर सम्मिलित होते हैं और देश की सच्ची एकता को बिना कहे ही अच्छी तरह प्रकट करते हैं। भारत के वनों की शोभा भी परम रमणीय है। हिमालय पर देवदारु के वृक्षों की ऊँचाई आकाश को चूमती है तो संसार के तटीय प्रदेशों में नारियल, सुपारी आदि वृक्षों की घनी वन पंक्तियाँ समुद्र के जल , को अपने दर्पण के समान समझती हैं। प्राकृतिक शोभा के कारणों से ही कश्मीर पृथ्वी का स्वर्ग ही माना जाता है। हमारे राष्ट्रगान में भारत के प्रमुख प्रदेशों, पर्वतों और नदियों की कीर्ति (को वर्णन) है। और दूसरे ‘वन्देमातरम्’ नाम के गीत में इस पृथ्वी की सुजलता, सुफलता और शस्य-श्यामलता वर्णित है।

(6) अयमस्माकं भारतदेशः संसारस्य गुरूरप्युच्यते। न केवलमुपनिषदामुत्तरवेदान्तस्य चाध्यात्मिकता, श्रुतिस्मृत्यादिषु प्रतिपादितो नैतिक आचारस्तथा विविधसिद्धिप्रदाता योगाभ्यास एवाद्यत्वेऽपि विदेशीयानामाकर्षणकारणं येन तेऽधुनानेकेष्वाश्रमेष्वत्र शान्ति मृगयमाणाः साधनां कुर्वन्ति स्वदेशेष्वपि तथाविधान् आश्रमांश्च संस्थापयन्ति। हरे कृष्णाद्यनेकसम्प्रदायानुभाव्य भक्तिमार्गमवलम्बन्तेऽपि च कामार्थाविति पुरुषार्थद्वयेऽपि ‘भारतस्य प्राचीनामुपलब्धिं बहु मन्यन्ते। वात्स्यायनं चाणक्यं चानुद्धृत्य यौन-विज्ञानस्य ‘राजनीतिविज्ञानस्य चेतिहासमापि प्रारब्धं न पारयन्ति। अनुल्लिख्य च सुश्रुतं न | शल्यक्झिानस्याविर्भावं प्रस्तोतुं शक्यते। गणितविद्यायामूलम् अङ्कलेखनप्रणाली सर्वप्रथम भारते एव आविर्भूता, ततश्च भारतीयेभ्यो अरब-देशीयैरवगतात।  अधुनापि अङ्क ‘हिन्दसा’ (हिन्दात् = भारतात् आगतः) इति कथयन्ति। यूरोपीयैस्तु तत्पश्चादेवारबवासिभ्यः सङ्ख्यालेखनप्रकारः शिक्षितः। स्वास्थ्यकृते योगासनशिक्षा तु ब्रिटेनादिदेशेषु अनेकत्र माध्यमिकविद्यालयेषु प्रचलिता। भारतजन्मा बौद्धधर्मोऽद्यापि कोटिभिर्विदेशीयानामनुस्रियते। महात्मा गान्धिना पुनरुद्घोषितो “अहिंसा परमो धर्मः” अद्यापि विश्वशान्तेरद्वितीय उपायः स्वीक्रियते। किन्तु हन्त! मिथः अविश्वसद्भिः परस्परं विभ्यभिस्तथोच्चैराकक्षमाणैः संसारस्य नैकैर्हठिभिर्नेतृभिस्तुदनुपालने वैवश्यमनुभूयते। त्यक्तेन भुञ्जीथा इत्यार्षसिद्धान्तमनुसृत्य ‘वसुधैव कुटुम्बकमिति’ आदर्श प्राप्ता जना एव विश्वशान्ति स्थापयितुं समर्था न तु आयुधेभ्यो धावमानाः मृत्युपण्याः कुशासकाः विश्वराजनेतारः।

शब्दार्थ
गुरूरप्युच्यते (गुरुः + अपि + उच्यते) = गुरु भी कहा जाता है।
प्रतिपादितः = ‘सिद्ध किया गया।
मृगयमाणाः = खोजते हुए।
उद्भाव्य = उत्पन्न करके।
अनुधृत्य = बिना उद्धरण
दिये। प्रारब्धम् = प्रारम्भ करना।
अनुल्लिख्य च = उल्लेख किये बिना।
प्रस्तोतुम् शक्यते = प्रस्तुत किया जा सकता है।
अवगता = जानी।
अनुत्रियते = अनुसरण किया जाता है।
स्वीक्रियते = स्वीकार किया जाता है।
हन्त = दुःख है।
मिथः = आपस में
बिभ्यद्भिः = डरने वाले।
वैवश्यम् अनुभूयते = विवशता अनुभव की जाती है।
भुञ्जीथा = भोग करो।
अनुसृत्य = अनुसरण करके।
धावमानाः = दौड़ते हुए।
मृत्युपण्याः = मौत के सौदागर।
विश्वराजनेतारः = विश्व के राजनेता।

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में भारत की आध्यात्मिकता, ज्ञान-विज्ञान एवं विश्व-शान्ति की स्थापना में भारतीय नीति की भूमिका का वर्णन किया गया है।

अनुवाद
यह हमारा भारत देश संसार का गुरु भी कहा जाता है। केवल उपनिषदों और उत्तर वेदान्त की आध्यात्मिकता ही नहीं, वेदों, स्मृतियों आदि में बतलाया गया नैतिक आचार तथा अनेक प्रकार की सिद्धियों को देने वाला योगाभ्यास ही आजकल भी विदेशियों के आकर्षण का कारण है, जिससे वे लोग अब अनेक आश्रमों में यहाँ शान्ति को खोजते हुए साधना करते हैं और अपने देशों में भी उस प्रकार के आश्रमों की स्थापना करते हैं। हरे कृष्ण’ आदि अनेक सम्प्रदायों को उत्पन्न करके भक्तिमार्ग का अवलम्बन करते हुए भी काम और अर्थ इन दो पुरुषार्थों को भी प्राचीन भारत की बड़ी (महान्) उपलब्धि समझते हैं। वात्स्यायन और चाणक्य का उद्धरण दिये बिना यौन-विज्ञान और राजनीति विज्ञान के इतिहास को भी प्रारम्भ करने में समर्थ नहीं हैं। सुश्रुत का उल्लेख किये बिना शल्य-विज्ञान की उत्पत्ति प्रस्तुत नहीं की जा सकती। गणित विद्या की मूलस्वरूप अंकों को लिखने की प्रणाली सबसे पहले भारत में भी उत्पन्न हुई और इसके बाद भारतीयों से अरब देश वालों ने जानी। आज भी अंकों को ‘हिन्दसा’ (हिन्द या भारत से आया हुआ) कहते हैं। यूरोप वालों ने तो उसके बाद ही अरब देश वालों से संख्या लिखने का तरीका सीखा। स्वास्थ्य के लिए योगासन की शिक्षा तो ब्रिटेन आदि देशों में अनेक जगह माध्यमिक स्कूलों में प्रचलित है। भारत में उत्पन्न बौद्ध धर्म को आज भी करोड़ों विदेशियों द्वारा अनुसरण किया जाता है। महात्मा गाँधी के द्वारा पुनः उद्घोषित ‘अहिंसा परमो धर्मः’ (के नारे) को आज भी विश्व-शान्ति का सर्वश्रेष्ठ उपाय स्वीकार किया गया है, किन्तु खेद है। आपस में विश्वास न करने वाले, आपस में डरने वाले तथा ऊँची आकांक्षा रखने वाले संसार के अनेक हठी नेता उनका पालन विवश होकर नहीं करते हैं। ‘त्यक्तेन भुञ्जीथाः’ (त्यागपूर्वक भोग करो) ऋषियों के इस सिद्धान्त का अनुसरण करके ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ (पृथ्वी ही कुटुम्ब के समान है)-इस आदर्श को प्राप्त हुए लोग ही विश्व-शान्ति को स्थापित करने में समर्थ हैं, आयुधों के लिए दौड़ते हुए, मृत्यु का व्यापार करने वाले, बुरे शासक, संसार के राजनेता नहीं।

(7) अस्माकं प्राचीनां वास्तुकलां शिल्पकलां च दशैं दशैं विस्फारितनेत्राणां विकसित देशवास्तव्यानां विस्मयचकिती वागपि न स्फुरति। खुजराहो कोणार्कादिमन्दिराणां स्थापत्यं मूर्तिकलां चावलोकयितुं लक्षशो विदेशीयाः पर्यटका अत्रागच्छन्ति। मुहम्मदीयैरपि शासकैरस्मिन् क्षेत्रे यद्विहितं तदपि ‘ताजमहल-कुतुबमीनारादि’ रूपेण प्रतिष्ठितं भारतीयं गौरवं वर्धयति। तदपि वैदेशिकैः सविस्मयं मुहुर्मुहुः स्तूयते। ताजमहलं तु तैः संसारस्य सप्तसु आश्चर्येषु गण्यते। भारतीयमूर्तिकलायास्तु, वैदेशिकास्तथा प्रशंसकोस्तदर्थं तथोन्मत्ताश्चे जायन्ते यल्लक्षशो रुप्यकाणां व्ययं कृत्वापि अवैधैरप्युपायैस्तास्कर्यादिभिः प्राचीनाः मूर्तीः प्राप्तुं यतन्ते। अहो! प्रशंसनीया तेषां कलाप्रीतिः, निन्दनीयाः अवैधा उपायाः, दयनीया च कलाकृतिदरिद्रता।

शब्दार्थ
वास्तुकला = भवन-निर्माण की कला।
शिल्पकला = शिल्प सम्बन्धी कला।
दशैं दर्श = देख-देखकर।
विस्फारितनेत्राणाम् = फटी हुई आँखों से देखते हुए।
वागपि = वाणी भी।
स्थापत्यम् मूर्तिकलां च = भवन-निर्माण कला और मूर्तिकला।
पर्यटकाः = घूमने वाले।
मुहम्मदीयैः अपि = मुसलमानों के द्वारा भी।
विहितम् = किया।
वर्धयति = बढ़ाती है।
मुहर्मुहुः = बार-बार।
स्तूयते = प्रशंसा की जाती है।
गण्यते = गिना जाता है।
अवैधैः उपायैः = गैरकानूनी तरीकों से।
तास्कर्यादिभिः = चोरी-तस्करी आदि से।
यतन्ते = यत्न करते हैं।
कलाकृतिदरिद्रता = कलाकृतियों की कमी या अभाव।

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में भारत की प्राचीन कला के प्रति गौरवानुभूति व्यक्त की गयी है।

अनुवाद
हमारी प्राचीन भवन-निर्माण कला और शिल्पकला को देख-देखकर फटी हुई आँखों से देखते हुए विकसित देश के निवासियों की विस्मय से चकित होकर वाणी भी नहीं निकलती है। खजुराहो, कोणार्क आदि के मन्दिरों की स्थापत्यकला और मूर्तिकला को देखने के लिए लाखों विदेशी पर्यटक यहाँ आते हैं। मुसलमान शासकों ने भी इस क्षेत्र में जो किया, वह भी ताजमहल, . कुतुबमीनार आदि के रूप में प्रतिष्ठित होकर भारत के गौरव को बढ़ा रहा है। उसकी भी विदेशियों के द्वारा विस्मय से बार-बार प्रशंसा की जाती है। ताजमहल को तो वे संसार के सात आश्चर्यों में गिनते हैं। भारत की मूर्तिकला के तो विदेश के लोग इतने प्रशंसक हैं और उनके लिए इतने पागल हो जाते हैं कि लाखों रुपये खर्च करके भी गैरकानूनी तरीकों, चोरी आदि से भी प्राचीन मूर्तियों को प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं। अहो! उनका कला-प्रेम प्रशंसा के योग्य है, गैरकानूनी तरीके निन्दा के योग्य हैं और कलाकृतियों का अभाव दया के योग्य है।

(8) अदभुतोऽयं परमगरिमा देशो यत्र नचिकेता इव ज्ञानपिपासवः जाबालेयसत्यकाम इव सत्यवादिनः, ध्रुव इव तपस्विनश्च बालकाः, अभिमन्युरिव शूराः किशोराः, एकलव्योद्दालककौत्ससदृशा गुरुभक्ताः शिष्याः शिविमयूरध्वजकर्णप्रभृतयो दानिनः, हरिश्चन्द्रयुधिष्ठिरादयः सत्यवादिनः, भरतलक्ष्मणसदृशाः भ्रातरः, सीतासावित्री-गान्धारी-सदृश्यः पन्याः, दशरथसदृशाः पितरश्च बभूवुः। मैत्रोयी-गार्गी-भारती-सदृश्यो विदुष्यो, रजियासुल्ताना-दुर्गावतीलक्ष्मीबाई सदृश्यो वीराङ्गनाः, भक्तसिंहसुखदेव-चन्द्रशेखर-सदृशाः देशभक्ताः, महावीरगौतमबुद्धगान्धितुल्या महात्मानः सन्ताश्चास्या एवं भारतभुवः सन्ततयः आसन्। देशान्तुरेषु धर्मस्य ग्लान्यां सत्यां क्वचिदीश्वरेण स्वकीयो दूतः प्रहितः क्वचिच्च सुतः अत्र तु स्वयं । भगवानेव मानवरूपमाधायावतीर्णः।।

शब्दार्थ
ज्ञानपिपासवः = ज्ञान प्राप्त करने के इच्छुक।
जाबालेय = जाबालि का पुत्र।
विदुष्यः = विदुषियाँ।
सन्ततयः = सन्ताने।
ग्लान्यां सत्यां = कमी होने पर
प्रहितः = भेजा।
मानवरूपमाधाय = मानव का रूप धारण करके।

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में भारत के ज्ञान-पिपासुओं, सत्यवादियों, तपस्वी बालकों, वीर किशोरों, गुरुभक्त शिष्यों, दानियों, सत्यवादियों, आदर्श भाई, पत्नी, पिताओं, विदुषी और वीरांगनाओं, देशभक्तों और सन्तों के प्रति गौरवानुभूति की गयी है।

अनुवाद
अत्यन्त गरिमा वाला यह देश अद्भुत है, जहाँ नचिकेता के समान ज्ञान प्राप्त करने के इच्छुक; जाबालि के पुत्र सत्यकाम की तरह सत्यवादी; ध्रुव की तरह तपस्वी बालक; अभिमन्यु की तरह वीर किशोर; एकलव्य, उद्दालक और कौत्स के समान गुरुभक्त शिष्य; शिवि, मयूरध्वज, कर्ण जैसे दानी; हरिश्चन्द्र, युधिष्ठिर आदि सत्यवादी; भरत और लक्ष्मण के समान भाई; सीता, सावित्री और गान्धारी के समान पत्नियाँ और दशरथ के समान पिता हुए हैं। मैत्रेयी, गार्गी और भारती के समान विदुषी स्त्रियाँ; रजिया सुल्तान, दुर्गावती, लक्ष्मीबाई जैसी  वीरांगनाएँ; भगतसिंह, सुखदेव और चन्द्रशेखर के समान देशभक्त; महावीर, गौतम बुद्ध और गाँधी के समान महात्मा और सन्त इसी भारत-भूमि की सन्तान थे। दूसरे देशों में धर्म की हानि होने पर कहीं ईश्वर के द्वारा अपना दूत भेजा गया और कहीं पुत्रे, परन्तु यहाँ तो स्वयं भगवान् ने ही मनुष्य का रूप धारण करके अवतार लिया।

(9) अधुनातनेऽप्यनेहसि भारतस्य विश्वस्मिन् भूमण्डले महत्त्वपूर्ण स्थानं वर्तते। स्वकीयाः पारतन्त्र्यशृङ्खला विभज्यास्माभिः सर्वेषामपि पराधीनदेशानां कृते साहाय्यमुघोषितम्। कस्यापि देशस्य प्रभुत्वसत्ता तत्रत्यजनेषु एव निहितेति सडिण्डिमं सिद्धान्तितम्। साम्यवादिदेशानां पुञ्जिवादिदेशानाञ्च वर्गात् पृथक् स्थित्वा विकसतां नवस्वतन्त्राणां देशानां कृते ताटस्थ्यनीतिः प्रचारिता, तेषां च पृथक् सङ्गठनं कृतं यस्य प्रभावो विश्वराजनीत्यां स्पष्टमनुभूयते। विकसितदेशानामार्थिकषड्यन्त्राणामुदघाटनं क्रियते। श्वेताङ्गानां रङ्गभेदनीतेर्विरुद्ध जनमतं सुदृढीकृतम्। भारतीयैः प्रयत्नैरेशियाऽफ्रीकामहाद्वीपीयदेशेषु यद् जागरणं जातं तेनैतेषां देशानां मानोऽपि जगति वर्धितः। आधुनिकविज्ञानौद्योगिकीयान्त्रिक्यादीनां नवज्ञानानां क्षेत्रे महान् विकासो विहितः। नैके आविष्काराश्च कृताः। कृष्युत्पादनं वर्धितम्। यत्र सूच्यपि नो निर्मीयते स्म तत्राधुना अत्याधुनिकानि यन्त्राणि निर्मीयन्ते। न केवलमविकसितेभ्यो देशेभ्योऽपि तु अमेरिकाब्रिटेन सदृशविकसितदेशेभ्योऽपि न केवलं हस्तशिल्पनिर्मितानि वस्तून्यपि तु उच्चाभियान्त्रिकीनिर्मयाणि सूक्ष्मयन्त्राणि अपि दीयन्ते। वैज्ञानिकानां यान्त्रिक्रीविशेषज्ञानां च यद् बाहुल्यं सम्प्रति । भारते वर्तते तत् संसारे द्वित्रिषु देशेषु भवेन्न वा। सहस्रशो विशेषज्ञा देशान्तराणि गत्वा तत्र तेषामुपचयं कुर्वन्ति। भारतीया यथा श्रमशीला न तथा अन्ये इति देशान्तरेषु प्रतिष्ठितम् तथ्यम्।।

शब्दार्थ
अधुनातनेऽप्यनेहसि = आधुनिक दिनों में भी, आधुनिककाल (आज) में भी।
विश्वस्मिन् भूमण्डले = सम्पूर्ण भूमण्डल पर।
विभज्य = भेदकर या काटकर।
निहितेति (निहिता +इति) = छिपी रहती है, ऐसा।
सडिण्डिमम् = ढिंढोरा पीटकर।
सिद्धान्तितम् = सिद्धान्त रूप में माना।
पुञ्जवादि = पूँजीवादी।
कृते = लिए।
ताटस्थ्यनीतिः = तटस्थता की नीति।
अनुभूयते = अनुभव की ।
जाती है।
सुदृढीकृतम् = मजबूत की।
मानोऽपि = मान भी।
विहितः = किया।
सूच्यपि = सुई भी।
दीयन्ते =दिये जाते हैं।
उपचयम् = वृद्धि।

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में संसार के देशों में भारत की राजनीतिक क्षेत्र में सर्वाधिक प्रगपि तथा तकनीकी ज्ञान के विकास का वर्णन किया गया है।

अनुवाद
आधुनिककाल में भी भारत का सम्पूर्ण भूमण्डल में महत्त्वपूर्ण स्थान है। अपनी पराधीनता की जंजीरों को काटकर हमने सभी पराधीन देशों के लिए सहायता की घोषणा की। किसी भी देश की प्रभुसत्ता वहाँ के लोगों में ही निहितं है, इसको ढिंढोरा पीटकर सिद्धान्ततः सिद्ध किया। साम्यवादी देशों और पूँजीवादी देशों के वर्ग से अलग रहकर विकसित नये स्वतन्त्र हुए देशों के लिए (हमने) तटस्थ नीति (निर्गुट नीति) का प्रचार किया और उसका अलग से संगठन बनाया, जिसका प्रभाव विश्व की राजनीति पर स्पष्ट रूप से अनुभव किया जाता है। विकसित देशों के आर्थिक षड्यन्त्रों का भण्डाफोड़ किया है। गौरांगों की रंगभेद नीति के विरुद्ध जनमत को दृढ़ किया। भारत के प्रयत्नों से एशिया, अफ्रीका महाद्वीप के देशों में जो जागरण हुआ, उससे इन देश का संसार में सम्मान भी बढ़ा। आधुनिक विज्ञान, औद्योगिकी और अभियान्त्रिक आदि के नये ज्ञान के क्षेत्र में बहुत विकास किया और अनेक आविष्कार (खोज) किये। कृषि का उत्पादन बढ़ाया है। जहाँ सूई भी नहीं बनायी जाती थी, वहाँ अब अति आधुनिक यन्त्र बनाये जा रहे हैं। केवल अविकसित देशों को ही नहीं, वरन् अमेरिका, ब्रिटेन सरीखे विकसित देशों को भी न केवल हस्तशिल्प से बनायी गयी वस्तुएँ, अपितु बड़े अभियान्त्रिकी के लिए बनाये जाने वाले सूक्ष्म यन्त्र भी दिये जा रहे हैं। वैज्ञानिक और अभियान्त्रिकी विशेषज्ञों की जो अधिकता इस समय भारत में है, वह संसार में दो-तीन देशों में भी हो या न हो। हजारों विशेषज्ञ दूसरे देशों में ज़ाकर वहाँ उनकी वृद्धि करते हैं। भारत के लोग जैसे परिश्रमी हैं, वैसे दूसरे नहीं-यह तथ्य दूसरे देशों में स्थापित है।

(10) उपर्युक्तविवरणेन विदितमेतद्भवति यत् भारतस्यातीतं तथा गौरवम् अद्याप्यस्मान् विश्वस्य सम्मुखं सम्मानस्योच्चैर्वेदिकायां प्रतिष्ठापयति। किन्तु केवलमतीतगौरवं तु भविष्यन्नेव निर्मातुं शक्नोति। वर्तमानकाले उपलब्धानां मानवसंसाधनानां सम्पदां च सर्वोत्तम उपयोगो विधेय येन विकासस्य गतिः प्रवर्धेत। सन्ति कश्चिदुर्दमाः समस्या याः कथमपि समाधेया एव। विदेशीया न वाञ्छन्ति यद् भारतं राजनीतिक्षेत्रे वित्तीयासु चोपलब्धिषु दृढ़ता गच्छेत्। अतस्ते भारतवासिषु मिथो भेदं प्रयुज्य कलहं कारयन्ति। धर्मं भाषां स्वनिवासक्षेत्र वा अग्रे कृत्वा समस्या उत्थाप्यन्ते। पञ्चाम्बुप्रदेशे केचन धर्मान्धा आतङ्कवादमनुसरन्ति विदेशीयैः प्रोत्साहिताः। प्रतिवर्षमनेके साम्प्रयदायिककलहो जायन्ते, निरपराधा जनाः प्रियन्ते, जनसम्पत्तिर्नश्यति देशस्य शक्तिक्षयो भवति। अतः सर्वैरपि अस्माभिः सौहार्देन मिथो वर्तितव्यम्। सर्वेषामपि धर्माणां सांस्कृतिकपरम्पराणां सामाजिकरीतिनामादरः कर्तव्यः। धर्मसाहसिभिश्चापि अवगन्तव्यं यद् राजनीत्या धर्मस्य सङ्कटः सर्वथा अश्रेयस्करः। देशजीवनस्य प्रधानधारायां सम्यनिमज्जनमेव सर्वेषां मङ्गलम्। द्वितीया तु जनसङ्ख्यायाः समस्या। जनसङ्ख्यायो अत्यधिकवृद्धेः कारणाद् विकासस्य लाभो विलीयते। अतः परिवारकल्याणमप्यवधेयम्। एवमपि सर्वैरवधेयं यत्सार्वजनिकजीवने विशेषतो भ्रष्टचारो रोधनीयः। अनुचितो लाभः न जातु केनापि स्पृहणीयः। तदर्थं न कश्चिदप्यनुरोद्धव्यः प्रोत्साहनीयो वैवश्यं वोपनेयः। न कदापि तथा वर्तितव्यं यद् भारतमातुविरुद्धं भवेत्। स वै अस्माकं जन्मभूमिर्यस्याः रजसि व्यमाविर्भूतान। भवेन्नाम कस्यापि शवो वह्मिसात् परस्य च भूमिसात् को नाम भेदः? अन्ते तु सर्वोऽपि अस्या भारतमातुरेव रजसि विलीनो भवति। तत् कोऽर्थः परस्परं कलहेन जन्मनः मातरं प्रति विद्रोहेण वा। सा तु सर्वदैव माननीया। यतो हि–”

“जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।”

शब्दार्थ
अतीतम् = बीता समय।
वेदिकायाम् = चबूतरे पर।
उपलब्धानां = प्राप्त हुई।
विधेयः = करना चाहिए।
प्रवर्धेत = बढ़ती रहे।
दुर्दमाः = दबाने में कठिना
समाधेया = समाधान की जाने योग्य।
वित्तीयासु = धन सम्बन्धों में
प्रयुज्य = प्रयोग करके।
उत्थाप्यन्ते = उभारी जा रही है।
पञ्चाम्बुप्रदेशे = पंजाब में।
अवगन्तव्यम् = जानना चाहिए।
अश्रेयस्करः = अहितकर।
मङ्गलम् = कल्याणकारी।
विलीयते = नष्ट हो रहा है।
अवधेयम् = ध्यान देना चाहिए।
रोधनीयः = रोकना चाहिए।
स्पृहणीयः = चाहा जाने योग्य।
जातु = कभी भी।
वैवश्यं = विवशता को।
वोपनेयः (वा + : उपनेयः) = अथवा ले जाना चाहिए।
वर्तितव्यम् = व्यवहार करना चाहिए।
रजसि = धूल में।
वह्निसात् = जलाया जाये।
भूमिसात् भवेत् = दफनाया जाना चाहिए।
स्वर्गादपि (स्वर्गात् + अपि) = स्वर्ग से भी।
गरीयसी = महान्।।

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में भारत की ज्वलन्त समस्याओं की ओर ध्यानाकृष्ट करके सबको प्रेम से रहने का सन्देश दिया गया है।

अनुवाद
ऊपर बताये गये विवरण से यह मालूम होता है कि भारत का अतीत और गौरव आज भी . हमें संसारे के सामने सम्मान के उच्च सिंहासन पर स्थापित करता है, किन्तु अतीत का गौरव भविष्य का निर्माण नहीं कर सकता है। वर्तमान समय में प्राप्त हुई मानव की सुविधाओं और सम्पत्तियों का सबसे उत्तम उपयोग करना चाहिए, जिससे विकास की गति बढ़े। कुछ दबाने में कठिन दुर्दमनीय समस्याएँ हैं, जिनको किसी तरह समाधान करना ही है। विदेश के लोग नहीं चाहते हैं कि भारत राजनीति के क्षेत्र में और आर्थिक उपलब्धियों में मजबूत बने; अतः वे भारतवासियों में आपस में फूट डालकर झगड़ा कराते रहते हैं। धर्म, भाषा या प्रदेश को आगे रखकर समस्याएँ पैदा की जाती हैं। पंजाब प्रदेश में कुछ धर्मान्ध विदेशियों के द्वारा उकसाये जाकर आतंकवाद का सहारा ले रहे हैं। प्रतिवर्ष अनेक साम्प्रदायिक झगड़े पैदा होते हैं, निर्दोष लोग मारे जाते हैं, जन-सम्पत्ति नष्ट होती है और देश की शक्ति का ह्रास होता है; अत: हम सबको आपस में भाईचारे से रहना चाहिए। सभी धर्मों, सांस्कृतिक परम्पराओं और सामाजिक रीति-रिवाजों का आदर करना चाहिए; अत: धर्म के अगुवाओं को भी समझ लेना चाहिए कि राजनीति के द्वारा धर्म का संकट पैदा करना सब तरह से अहितकर है। देश के जीवन की मूलधारा में अच्छी तरह मिल जाने में ही सबका कल्याण है। दूसरी जनसंख्या की समस्या है। जनसंख्या बहुत अधिक बढ़ने से विकास का लाभ नष्ट हो जाता है; अतः परिवार कल्याण की ओर भी ध्यान देना चाहिए। यह भी सबको ध्यान देना चाहिए कि सार्वजनिक जीवन में विशेष रूप से भ्रष्टाचार को रोका जाए। किसी को (कभी) भी अनुचित लाभ की इच्छा नहीं करनी चाहिए। उसके लिए न किसी से अनुरोध किया जाए अथवा विवश होकर न प्रोत्साहन दिया जाए। कभी भी ऐसा व्यवहार नहीं करना चाहिए, जो भारतमाता के प्रतिकूल हो। (निश्चय ही) यह । हमारी जन्मभूमि है, जिसकी धूल में हम उत्पन्न हुए हैं। किसी को मृत शरीर जलाया जाए या दफनाया जाए-दोनों में क्या अन्तर है? अन्त में तो सभी इस भारतमाता की धूल में मिल जाते हैं। आपस में झगड़ने से अथवा जन्म की माता के प्रति विद्रोह करने से क्या लाभ? वह. तो सदा ही सम्मान के योग्य है; क्योंकि माता और जन्मभूमि स्वर्ग से भी श्रेष्ठ हैं।”

लघु उत्तरीय प्ररन

प्ररन
भारतवर्ष पर एक छोटा-सा निबन्ध लिखिए। या ‘भारतवर्षम्’ पाठ का सारांश लिखिए।
उत्तर
[संकेत-‘पाठ-सारांश’ मुख्य शीर्षक के अन्तर्गत दी गयी सामग्री को संक्षेप में अपने शब्दों में लिखिए।]

प्ररन
भारत की भौगोलिक परिस्थिति का वर्णन ‘भारतवर्षम्’ पाठ के आधार पर कीजिए।
उत्तर
[संकेत-‘पाठ-सारांश’ शीर्षक के अन्तर्गत आये तीन शीर्षकों-‘प्रहरी हिमालय’, ‘तीन दिशाओं में समुद्र’, ‘तटीय प्रदेश’–की सामग्री को संक्षिप्त रूप में अपने शब्दों में लिखें।

प्ररन
भारत की प्रमुख समस्याएँ बताइए और उनके समाधान पर प्रकाश डालिए। |
उत्तर
[संकेत—‘पाठ-सारांश’ मुख्य शीर्षक के अन्तर्गत आए शीर्षक ‘समस्याएँ’ की सामग्री को अपने शब्दों में लिखें।]

प्ररन
भारत के प्राचीन गौरव पर ‘भारतवर्षम्’ पाठ के आधार पर प्रकाश डालिए। |
उत्तर
[संकेत-पाठ-सारांश’ मुख्य शीर्षक के अन्तर्गत आये तीन शीर्षकों-संसार का गुरु’, ‘कला की प्रगति’, ‘महापुरुषों की पवित्र भूमि’–की सामग्री को संक्षिप्त रूप में अपने शब्दों में लिखें।]

प्ररन
भारतवर्ष का यह नाम किस आधार पर पड़ा है?
उत्तर
[संकेत-पाठ-सारांश’ मुख्य शीर्षक के अन्तर्गत आये शीर्षक ‘नामकरण’ की सामग्री को अपने शब्दों में लिखें।]

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