Chapter 10 सुभाषचन्द्रः

अवतरणों का ससन्दर्भ अनुवाद

(1) सप्तनवत्युत्तराष्टादशशततमेऽब्दे ……………….. स्वीकृतवान्।

[सप्तनवत्युत्तरराष्टादशशततमेऽब्दे (सप्तनवति-97 + उत्तर-ऊपर, अधिक + अष्टादशशततमे1800वें +अब्दे-वर्ष में = सन् 1897 ई० में। बङ्गभुवम् अलञ्चकार = बंगभूमि (बंगाल) को अलंकृत किया। राजकीय-प्राडिववाकः = सरकारी वकील। परीक्षामुत्तीर्यापि (परीक्षाम् + उत्तीर्य + अपि) = परीक्षा को “उत्तीर्ण करके भी। भृत्यत्वम् = दासता को।]

सन्दर्भ – यह गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत दिग्दर्शिका’ के ‘सुभाषचन्द्रः’ नामक पाठ से उद्धृत है।

[ विशेष-इस पाठ के शेष सभी गद्यांशों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।]

अनुवाद – सन् अठारह सौ सत्तानबे (1897) के जनवरी मास की तेईस तारीख को श्री सुभाष ने अपने जन्म से बंगाल को अलंकृत (सुशोभित) किया। इनके पिता जानकीनाथ वसु सरकारी वकील थे। सुभाष बचपन से ही बुद्धिमान्, धीर (धैर्यशाली), साहसी और प्रतिभासम्पन्न थे। इन्होंने कलकत्ता नगर में शिक्षा पाकर आई० ए० एस० (वस्तुतः आई० सी० एस०) की सम्मानित परीक्षा उत्तीर्ण करके भी विदेशी शासन की नौकरी स्वीकार न की।

(2) आङ्ग्लशासकानां ………………… बहिर्गतः।
आङ्ग्लशासकानां ……………………. नात्यजत् ।
आइग्लशासकानां ………………… अङ्गीकृतवान्।
अहिंसामात्रेण ………………………….. बहिर्गतः।
आङ्ग्लशासकानां ……………………. सम्पादिता।

[ भीताः = इरे हुए। अक्षिपन = डाला। सप्तत्रिंशदुतैरेकोनविंशतिशततमे (सप्तत्रिंशत्-37 +उत्तर-ऊपर, अधिक +एकोनविंशतिशततमे-1900वें में = सन 1937 में। वृतः = चुने गये। रथेऽस्य= रथ में इनकी। अस्योग्रक्रान्तेः (अस्य + उग्र + क्रान्तेः) = इनके उग्र क्रान्तिपरक विचारों से (या इनकी उग्र क्रान्ति से)। व्यदीर्यत = विदीर्ण हो गया, फट गया। स्वेष्टसिद्धिम् (स्व +इष्टसिद्धिम्) =अपने अभीष्ट की प्राप्ति को। कामयमानः = कामना (इच्छा) करता हुआ।]

अनुवाद – ‘अंग्रेज शासकों का भारत पर (कोई) अधिकार नहीं, वे विदेशी (लोग) यहाँ क्यों शासन कर रहे हैं? ऐसे चिन्तन से युक्त हो इन्होंने अपने प्रयत्न से भारतवर्ष की स्वतन्त्रता के लिए बहुत-से भारतीयों को अपने पक्ष में कर लिया। इनके ऐसे उग्र विचारों से भयभीत हुए अंग्रेज शासकों ने इन्हें बार-बार कारागार (जेल) में डाला, किन्तु इस वीर ने स्वतन्त्रता के लिए अपने प्रयास को न छोड़ा। सन् 1937 ई० में ये कांग्रेस के लिए त्रिपुरा अधिवेशन में सर्वसम्मति से सभापति चुने गये और इनके सम्मान में नागरिकों ने, पचास बैलों वाले रथ में इनकी शोभायात्रा (जुलूस) निकाली। ‘केवल अहिंसा से स्वतन्त्रता-प्राप्ति का प्रयत्न कल्पनामात्र ही है’ यह निश्चय करके इन्होंने क्रान्ति का पक्ष (मार्ग) स्वीकार किया। इनकी उग्र क्रान्ति से डरे हुए अंग्रेज शासकों ने इन्हें फिर से कलकत्ता नगरी के कारागार में बन्द कर दिया। इस दुःखदायी समाचार को सुनकर सुभाष-प्रेमी भारतीयों के हृदय को आघात पहुँचा। एक दिन रात में जेल के पहरेदारों के सो जाने पर यह वीर सहसा (अचानक) उठकर दुष्ट के साथ दुष्टता का व्यवहार करना चाहिए’ इस नीति के अनुसार अपने अभीष्ट (लक्ष्य) की प्राप्ति की कामना से सिद्धि (सफलता) देने वाली (भगवती) दुर्गा का स्मरण कर जेल से बाहर निकल गया।

(3) प्रातः सुभाषमनवलोक्य ……………….. इत्यासीत्।
प्रातः सुभाषमनवलोक्य ……………… जर्मनी देशं गतः।
प्रातः सुभाषमनवलोक्य ………….. (जापान) देशं गतः।

[सुभाषमनवलोक्य (सुभाषम् + अनवलोक्य) = सुभाष को न देखकर। भृशमन्विष्यापि (भृशम् + अन्विष्य +अपि) = बहुत हूँढ़कर भी। अवधानपूर्वकम् = सावधानी से। निरीक्षणे कृतेऽपि = चौकसी रखे
जाने पर भी। अभिवादनपदम् = अभिवादन (परस्पर नमस्कार) का शब्द। उद्घोषः = नारा।]

अनुवाद – प्रात:काल सुभाष को न देखकर जेल के सारे निरीक्षक आश्चर्यचकित रह गये (और) बहुत खोजने पर भी उन्हें न पा सके। कारागार से निकलकर सुभाष वेश बदलकर पेशावर गये। वहाँ उत्तमचन्द्र नामुक व्यापारी के घर में कुछ समय रहे। इसके बाद अंग्रेज शासकों द्वारा सावधानी से चौकसी रखे जाने पर भी ‘जियाउद्दीन’ नाम से जर्मनी देश गये। वहाँ के शासक हिटलर के साथ मित्रता करके वायुयान द्वारा जापान देश गये।
अपने संगठन-कौशल से उन्होंने मलाया में ‘आजाद हिन्द फौज’ नाम से सेना संगठित की। उनके इस संगठन में हिन्दू, मुसलमान आदि सभी धर्मों के अनुयायी राष्ट्रप्रेमी वीर सम्मिलित थे। इस संगठन का अभिवादन शब्द (परस्पर नमस्कार का शब्द) ‘जयहिन्द’ और नारा ‘दिल्ली चलो’ था।

(4) यूयं मह्यं …………………… चरणयोरर्पितानि।।

[रक्तमर्पयत् (रक्तम् +अर्पयत्) = खून दो। त्वरितमेव (त्वरितम् +एव) = शीघ्र ही। अवतीर्णः = उतर गया। ब्रह्मदेश – बर्मा। सुवर्णसूत्राण्यपि (सुवर्णसूत्राणि +अपि) = सुवर्णसूत्र अर्थात् मंगलसूत्र भी।]

अनुवाद – ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा’-ये रोमांचित कर देने वाले शब्द सुभाष के मुख से जिसने भी सुने, वह तुरन्त ही उनके साथ स्वतन्त्रता-संग्राम में सैनिक के रूप में उतर पड़ा (सम्मिलित हो गया)। (आजाद हिन्द फौज के संगठन) उस समय बर्मा (अब म्यांमार) में रहने वाली स्त्रियों ने अपने आभूषणों के साथ सोने के सौभाग्यसूचक मंगलसूत्र भी सुभाष के चरणों में अर्पित कर दिये।

(5) ‘दिल्लीं चलत, …………………… इति सुनिश्चितम् ।

[ नातिदूरे (न +अतिदूरे) = अधिक दूर नहीं है। प्रस्थिताः = प्रस्थान किया। बन्दीकृताः = बन्दी बना लिये गये। सप्तचत्वारिंशदुत्तरैकोनविंशतिशततमेऽब्दे (सप्तचत्वारिंशत् + उत्तर + एकोनविंशति । शततमे +अब्दे) = 1947 ई० में।]

अनुवाद – दिल्ली चलो, दिल्ली अधिक दूर नहीं’ -सुभाष के इन उत्साहवर्द्धक शब्दों से (प्रेरित होकर) सैनिक दिल्ली को चल पड़े। इसी बीच दुर्भाग्यवश जापान की हार से सुभाष के सारे सैनिक अंग्रेजों द्वारा बन्दी बना लिये गये।
इस वीरश्रेष्ठ की स्वतन्त्रता-प्राप्ति की इच्छा सन् 1947 ई० में अगस्त महीने की 15 तारीख को पूरी हुई। आज हमारे बीच विद्यमान न होने पर भी सुभाष ‘जिसकी कीर्ति है वह जीवित है’ की उक्ति के अनुसार सदैव अमर हैं, यह निश्चित है।

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