Chapter 14 पुण्यसलिलागङ्गा (गद्य – भारती)

पाठ-सारांश

गंगा का महत्त्व-गंगा का संसार की सभी नदियों में महत्त्वपूर्ण स्थान है। यह भारतीयों के लिए जीवनदायिनी है, सुख-शान्ति और समृद्धि प्रदान करने वाली है। इसमें स्नान करने, जल पीने अथवा इसका नाम लेने मात्र से भी मनुष्य धन्य हो जाता है। इसके सम्पर्क मात्र से मनुष्य के दैहिक, दैविक और भौतिक तीनों ताप (कष्ट) नष्ट (समाप्त) हो जाते हैं।

उद्गम-गंगा हिमालय के दो स्थानों से निकलती है। इसकी एक धारा उत्तरकाशी में गोमुख से उत्पन्न होकर भागीरथी कहलाती है और दूसरी धारा जो चमोली जिले के अलकापुरी में बर्फ पिघलने से निकलती है, ‘अलकनन्दा’ नाम से प्रसिद्ध हुई। देवप्रयाग में भागीरथी और अलकनन्दा की धारा ने एक होकर ‘गंगा’ नाम धारण कर लिया। । पौराणिक स्वरूप-पुराणों के अनुसार स्वर्ग में ‘देवी गंगा ब्रह्मा के कमण्डल में द्रवीभूत रूप में स्थित थी। फिर भगीरथ के तप के प्रभाव से राजा सागर के साठ हजार भस्मीभूत पुत्रों का उद्धार करने हेतु पृथ्वी पर आयी और ‘भागीरथी’ कहलाने लगी। भगवान् विष्णु के चरणों के नखों से उत्पन्न होने के कारण इसे ‘विष्णु-नदी’ कहते हैं। भगीरथ के मार्ग का अनुसरण करते हुए महामुनि जह्न की यज्ञस्थली को डुबोने के कारण कुपित जह्न ने गंगा के जल को पी लिया था, लेकिन देवताओं और ऋषियों द्वारा प्रसन्न किये जाने पर उन्होंने इसे कर्ण-विवर से भूमि पर गिरा दिया था; अत: ‘जाह्नवी नाम से प्रसिद्ध हुई।

नाम की सार्थकता-‘गम्’ धातु में गन् प्रत्यय और स्त्रीलिंग के ‘टाप् प्रत्यय के योग से ‘गंगा’ शब्द बना है, जिसका अर्थ है–निरन्तर गतिशील रहना। निरन्तर बहते रहने के कारण ही इस नदी का ‘गंगा’ नाम सार्थक है।। | गंगा का उपकार-गंगा हिमालय की दुर्लंघ्य चट्टानों को चूर्ण करती हुई, सघन वनों की बाधाओं को पार कती हुई, गुफाओं में प्रवाहित होती हुई, पर्वत की तलहटियों में वेग से बहती हुई, ऊँचे-नीचे पर्वत प्रदेशों को लाँघती हुई हरिद्वार से समतल प्रदेश में आती है। भारतभूमि को धन-धान्यसम्पन्न बनाने के लिए गंगा का महान् उपकार है। गंगा कृषिप्रधान भारत देश में अन्नोत्पादन में जितनी सहायता करती हैं, उतनी सहायता अन्य कोई नदी नहीं करती। इसके तटीय प्रदेशों में उत्पन्न वनस्पतियों और ओषधियों के अवर्णनीय लाभ हैं। इस प्रकार गंगा हमारे लिए बहुत ही उपयोगी नदी है।

प्राकृतिक शोभा-गंगा की प्राकृतिक शोभा सबके चित्त को प्रसन्नता प्रदान करती है। इसके तटवर्ती देखने योग्य स्थानों को देखकर विदेशी पर्यटक भी इसकी प्रशंसा करते हैं। सूर्य की किरणों और चन्द्रमा की रश्मियों से इसके जल की शोभा अत्यधिक बढ़ जाती है। गंगा-तटों पर स्थित घाटों की निराली शोभा को देखकर अपरिमित सुख और शान्ति मिलती है।

तीर्थस्थल और गंगा की पवित्रता-गंगा के तट पर बदरीनाथ, पञ्चप्रयाग, ऋषिकेश, हरिद्वार, पढ़मुक्तेश्वर, तीर्थराज प्रयाग, वाराणसी आदि तीर्थस्थान हैं। आदिकवि वाल्मीकि और ऋषि भरद्वाज के आश्रम भी गंगा के तट पर ही थे। गंगा-तट रामानुज, कबीर, तुलसी आदि महापुरुषों के प्रेरणा-स्थल रहे हैं। गुरु तेगबहादुर ने इसी के तट पर घोर तप किया था। श्रृंगेरी मठ में स्थित शिव-विग्रह पर गंगा का जल चढ़ाना महान् पुण्य-कार्य समझा जाता है। । हिमालय से समुद्र तक गंगा के तट पर स्नान, देवाराधना, दान, यज्ञ आदि पुण्यप्रद कार्य होते हैं। हरिद्वार और प्रयाग में कुम्भ स्नान, वाराणसी में भगवान् विश्वनाथ के दर्शन का लाभ पुण्यात्मा ही प्राप्त करते हैं। इसके तीर्थों पर धर्मशास्त्र, वेद, पुराणादि का पठन-पाठन और व्याख्यान होता है। देश-देशान्तर से आये हुए धनी-निर्धन, साधारण-असाधारण भक्तजन एक ही घाट पर स्नान करते हैं-इस प्रकार यह गंगा भारत की एकता और अखण्डता को दृढ़ बनाती है।

ऐतिहासिक महत्त्व-गंगा के तट पर काशी में रघुवंशी राजाओं ने विश्व-विजय के बाद अश्वमेध यज्ञ किये थे। प्रयाग में इसी के तट पर आयोजित मेले में महाराज हर्षवर्धन अपने शरीर के वस्त्रों को छोड़कर याचकों को सर्वस्व दान दे देते थे। हस्तिनापुर, कन्नौज, प्रतिष्ठानपुर, पाटलिपुत्र (पटना), काशी आदि इसी के तटों पर स्थित नगर प्राचीनकाल में प्रसिद्ध राजाओं की राजधानी थे।

औद्योगिक महत्त्व-आधुनिक काल में गंगा के तट पर अनेक औद्योगिक संस्थान हैं जिनमें इसकी विशाल जलराशि का सदुपयोग होता है। इसके जल-प्रवाह की सहायता से विद्युत-निर्माण होता है। इसी के तट पर बुलन्दशहर जिले के नरौरा’ नामक स्थान पर अणुशक्ति से संचालित विद्युत्-गृह है।

विशेषताएँ–गंगा का जल स्वच्छ, शीतल, प्यास बुझाने वाला, पीने में स्वादिष्ट और रुचिवर्द्धक, रोगनाशक और कभी खराब न होने वाला होता है। वैज्ञानिकों ने जल की परीक्षा करके सिद्ध कर दिया है कि गंगा-जल में रोग के जीवाणु स्वयं नष्ट हो जाते हैं। हिन्दू लोग गंगा के पवित्र जल को घरों में रखते हैं और देवी-देवताओं के पूजन-कार्य में इसका उपयोग करते हैं। यह जल बहुत समय तक भी दूषित नहीं होता है। मरणासन्न व्यक्ति के गले में इसके जल को औषध के रूप में डाला जाता है। । जल-प्रदूषण की समस्या–भारत देश का दुर्भाग्य है कि लोग स्वार्थ के कारण गंगा के जल को प्रदूषित करते जा रहे हैं। बड़े उद्योगों के रासायनिक अपशिष्ट इसके जल में घुलकर इसे दूषित कर रहे हैं। बड़े नगरों की समस्त गन्दगी को गंगा के जल में ही मिला दिया जाता है। मरे हुए पशु और मानवों के शव गंगा के जल में प्रवाहित कर दिये जाते हैं। गंगा के तट पर स्थित मन्दिरों और धर्मशालाओं में समाज-विरोधी तत्त्व प्रवेश कर अनैतिक कार्य करते हैं। लोग प्रमाद और अज्ञान के कारण लोक-कल्याणकारी गंगा के जल को दूषित कर अमृत में विष घोल रहे हैं। सबको पवित्र करने वाली गगा अब अपनी शुद्धि के लिए मानवे का मुंह ताक रही है।

प्रदूषण दूर करने का प्रयास–प्रदूषित गंगा के जल के प्रदूषण को दूर करने के लिए भारत सरकार ने केन्द्रीय विकास प्राधिकरण की स्थापना की है। सिनेमा, दूरदर्शन, रेडियो, समाचार-पत्र आदि संचार माध्यमों के माध्यम से गंगा के प्रदूषण को रोकने के लिए जनचेतना जाग्रत की जा रही है, परन्तु सरकार ही अकेले इस महान् कार्य को नहीं कर सकती। इसमें बालक, वृद्ध, स्त्री-पुरुष सभी के सहयोग की परम आवश्यकता है।

यदि मन-वचन-काय और पूरी निष्ठा से गंगा के प्रदूषण को दूर करने का संकल्प करें तो गंगा की पावनता की रक्षा हो सकती है।

शोंगद्यां का ससन्दर्भ अनुवाद

(1) गङ्गायाः न केवल भारतवर्षे, अपितु निखिलविश्वस्य नदीषु महत्त्वपूर्ण स्थानं क्र्तते। इयं खलु भारतीयप्राणिनां जीवनप्रदा सुखशान्तिसमृद्धिविधायिनी च नदीति नास्ति सन्देहकणिकावलेशः। यतो हि भारतीयानां मतानुसारमियं न केवलमैहिकानि सुखान्येव वितरति परञ्च -पारलौकिकं लक्ष्यमपि पूरयति। सुरधुन्यामस्यामवगाहनेन जलस्पर्शेन अथ च नामसङ्कीर्तनमात्रेण मानवो धन्यो जायते। ‘गङ्गा तारयति वै पुंसां दृष्टा, पीताऽवगाहिता’ इति श्रद्धाभावनया मुमुक्षुः गङ्गातीरमाश्रित्य सर्वदास्याः कृपामीहते। सत्यम् , मनुजस्य दैहिकदैविक भौतिकतापत्रयमस्याः सम्पर्कमात्रेण विनश्यति। तथा चोक्तम्| गङ्गां पश्यति यः स्तौति स्नाति भक्त्या पिबेज्जलम् ।से स्वर्गज्ञानममलं योगं मोक्षं च विन्दति ॥

शब्दार्थ
निखिलविश्वस्य = सम्पूर्ण संसार की।
खलु = निश्चय ही।
जीवनप्रदा = जीवन प्रदान करने वाली।
विधायिनी = करने वाली।
कणिकावलेशः = कणभर भी।
यते हि = क्योंकि।
ऐहिकानि = सांसारिक।
पूरयति = पूरा करती है।
सुरधुन्याम् = गंगा में।
अगाहनेन = स्नान करने से।
सङ्कीर्तन = कथन, वर्णन।
मुमुक्षुः = मोक्ष-प्राप्त करने का इच्छुक।
ईहते = चाहता है।
विनश्यति = नष्ट हो जाता है।
अमलं = पवित्र
विन्दति = प्राप्त करता है।

सन्दर्थ
प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत गद्य-भारती’ में संकलित ‘पुण्यसलिला गङ्गा’ शीर्षक पाठ से उद्धृत है।
[संकेत–इस पाठ के शेष गद्यांशों के लिए भी यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।]

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में गंगा की महिमा का वर्णन किया गया है।

अनुवाद
गंगा का केवल भारतवर्ष में ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण संसार की नदियों में महत्त्वपूर्ण स्थान है। यह निश्चय ही भारतीय प्राणियों को जीवन, सुख, शान्ति और समृद्धि को प्रदान करने वाली  नदी है, इसमें जरा भी सन्देह नहीं है; क्योंकि भारतीयों के मत के अनुसार यह केवल ऐहिक (सांसारिक) सुखों को ही नहीं देती है, अपितु पारलौकिक लक्ष्य को भी पूर्ण करती है। इस गंगा नदी में स्नान करने से, जल का स्पर्श करने से और नाम का उच्चारण करनेमात्र से मनुष्य धन्य हो जाता है। | ‘निश्चय ही पुरुषों की देखी गयी, पान की गयी, स्नान की गयी गंगा सांसारिक कष्टों से छुटकारा देकर मोक्ष प्रदान करती है। ऐसा श्रद्धा की भावना से मोक्ष-प्राप्त करने का इच्छुक व्यक्ति गंगा के तट पर पहुँचकर सदा इसकी कृपा चाहता है। सत्य ही, मनुष्य के दैहिक (शारीरिक), दैविक और भौतिक तीनों ताप इसके समागम से नष्ट हो जाते हैं। जैसा कि कहा है–

जो (मनुष्य) भक्ति से गंगा को देखता है, स्तुति करता है, स्नान करता है और जल पीता है; वह निर्मल स्वर्ग, ज्ञान, योग और मोक्ष को प्राप्त करता है। |

(2) सुरधुनीयम् आदौ हिमवतः स्थानद्वयात् निःसृता। धारैका भारतस्योत्तराखण्डे उत्तरकाशीजनपदे गोमुखात् प्रसूता भागीरथी। द्वितीया’चमोली’ जनपदे अलकापुर्या हिमप्रस्रवणात् निर्गतालकनन्देति विदिता। गङ्गोत्रीभागीरथ्योः उद्गमस्थले विस्तृता सुरम्या वनस्थली प्रथिता। देवप्रयागे भागीरथ्यलकनन्दयोः सङ्गमानन्तरं संयुक्तधारा ‘गङ्गा’ इति लोके प्रसिद्धा। वेदपुराणादीनां मतेन पुरा देवी’ रूपा गङ्गा स्वर्गे एव वसति स्म।द्रवीभूताचसा विधातुः कमण्डलौ संस्थिता। कपिलमुनिशापेन भस्मीभूतषष्टिसहस्रसगरपुत्रान् समुद्धर्तु भगीरथस्य तपःप्रभावेण वसुन्धरामानीता लोके भागीरथी’ इति नाम्ना ख्याता। भगवतः विष्णोः पदनखोद्भूता अतः विष्णुनही इति ज्ञाता। भगीरथस्य वत्मनुसरतीयं गिरिगह्वरकोनननगरग्रामान्प्लावयन्ती महामुनेः जह्रोः यज्ञस्थली प्लवयितुमारभत। सञ्जातक्रोधः मुनिः निखिलं जलप्रवाहे क्षणमात्रेणापिबत्। भग्नमनोरथः नृपः रुष्टं महामुनिं प्रसादयितुं प्रायतत। देवानामृषीणां तस्या- राधनेन च विगतक्रोधो महात्मा कर्णरन्ध्राभ्यामशेषमुदकं निष्कास्य वसुन्धरायां पातयामास, अतएव जाह्नवीति प्रसिद्धा।

शब्दार्थ
सुरधुनी = गंगा का एक.नाम।
आदौ = प्रारम्भ में।
हिमवतः = हिमालय के।
धारैका = एक धार।
प्रसूता = उत्पन्न हुई।
प्रस्रवणात् = पिघलने से।
निर्गता = निकली।
प्रथिता = प्रसिद्ध
विधातुः = ब्रह्माजी के।
षष्टिसहस्र = साठ हजार।
वसुन्धराम् आनीता = धरती पर लायी गयी।
ख्याता = प्रसिद्ध हुई।
ज्ञाता = जानी गयी।
वत्र्मानुसरन्ती = मार्ग का अनुसरण करती हुई।
प्लावयन्ती = डुबोती हुई।
जह्रोः = जह्न की।
सञ्जतक्रोधः = क्रोधित हुए।
निखिलं = सम्पूर्ण को।
रुष्टम् = क्रोधित हुए।
प्रसादयितुम् = प्रसन्न करने के लिए।
प्रायुतत = प्रयत्न किया।
कर्णरन्ध्राभ्यामशेषमुदकं (कर्ण + रन्ध्राभ्याम् + अशेषम् + उदकम्) = कानों के दोनों क्षिद्रों से पूरे जल को।
निष्कास्य = निकालकर
पातयामास = गिरा दिया।

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में गंगा के उद्गम स्थान के साथ-साथ भागीरथी, अलकनन्दा, विष्णुनदी, जाह्नवी, आदि नामों के प्रसिद्ध होने का कारण बताया गया है।

अनुवाद
यह गंगा प्रारम्भ में हिमालय के दो स्थानों से निकली। एक धारा भारत के उत्तराखण्ड में उत्तरकाशी जिले में गोमुख (स्थान का नाम) से उत्पन्न हुई ‘भागीरथी’ कहलायी। दूसरी (धारा) चमोली जिले में अलकापुरी में बर्फ के पिघलने से निकली ‘अलकनन्दा’ जानी गयी। गंगोत्री और भागीरथी के उद्गम स्थान पर फैली हुई सुन्दर वनस्थली प्रसिद्ध है। ‘देवप्रयाग में भागीरथी और अलकनन्दा के मिलने के पश्चात् मिली हुई धारा ‘गंगा’ इस नाम से संसार में प्रसिद्ध है। वेद, पुराण

आदि के मतानुसार पहले देवी के रूप में गंगा स्वर्ग में ही रहती थी। पिघली हुई वह ब्रह्माजी के ‘कमण्डल में स्थित थी। कपिल मुनि के शाप से भस्म हुए साठ हजार सगर के पुत्रों का उद्धार करने के लिए भागीरथ के तप के प्रभाव से पृथ्वी पर लायी हुई ‘भागीरथी’ इस नाम से संसार में प्रसिद्ध हुई। भगवान् विष्णु के पैरों के नाखूनों से उत्पन्न हुई, अतः ‘विष्णुनदी’ जानी गयी। भगीरथ के मार्ग का अनुसरण करती हुई, यह पर्वतों, गुफाओं, वनों, नगरों और ग्रामों को डुबोती हुई इसने महामुनि जहू की यज्ञस्थली को डुबोना प्रारम्भ कर दिया। क्रोधित हुए मुनि ने सम्पूर्ण जल के प्रवाह को क्षणभर में ही पी लिया। मनोरथ नष्ट हुए राजा ने क्रुद्ध महामुनि को प्रसन्न करने का प्रयत्न किया। देवों और ऋषियों की उसकी (जह्न) आराधना से क्रोधरहित हुए महात्मा ने कानों के छिद्र से सम्पूर्ण जल को निकालकर पृथ्वी पर गिरा दिया। इसीलिए ‘जाह्नवी’ नाम से प्रसिद्ध हुई।।

(3) गङ्गेति नाम सहजं सार्थकञ्च। गम् धातोः औणादिकं गन् प्रत्यये सति स्त्रीत्वात् टापि ‘गङ्गा’ शब्दा निष्पद्यते। अतः सततगमशीलत्वात् ‘गङ्गा’ इति नाम सर्वथाऽन्वर्थम्।

शब्दार्थ
निष्पद्यते = निष्पन्न (पूर्ण) होता है, सिद्ध होता है।
सर्वथान्वर्थम् (सर्वथा + अनु +अर्थम्) = सभी प्रकार अर्थ के अनुसार।

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में गंगा का व्युत्पत्तिपरक अर्थ दिया गया है।

अनुवाद
‘गंगा’ यह नाम स्वाभाविक और सार्थक है। ‘गम्’ धातु से औणादिक ‘गन्’ प्रत्यय लगाने पर स्त्रीलिंग होने से ‘टाप् प्रत्यय लगाने पर ‘गंगा’ शब्द निष्पन्न होता है। अतः निरन्तर | गमनशील होने के कारण ‘गंगा’ यह नाम अर्थ के अनुसार है। |

(4) इयञ्च गङ्गा हिमालयस्य दुर्लङ्घ्यप्रस्तरखण्डानि चूर्णयन्ती सघनवनानामवरोधं त्रोटयन्ती, गिरिगह्वरेषु प्रविशन्ति उपत्यकाधित्यकासु द्रुतगत्या विहरन्ती नतोन्नतपर्वत-प्रदेशान् लड्यन्ती हरिद्वारे समतलप्रदेशे निर्बाधतया प्रवहति। आर्यावर्तस्य धरित्रीं शस्य-श्यामलां निर्मातुं गङ्गायाः उपकारः अनिर्वचनीयः।।

शब्दार्थ
दुर्लङ्घ्य = कठिनाई से लाँघने योग्य।
प्रस्तरखण्डानि = पत्थर के टुकड़े।
चूर्णयन्ती = चूर-चूर करती हुई।
त्रोटयन्ती = तोड़ती हुई।
गिरिगह्वरेषु = पर्वत की गुफाओं में।
द्रुतगत्या = तेज चाल से।
नतोन्नतपर्वतप्रदेशान् = नीचे-ऊँचे पर्वत के भागों को।
लङ्घयन्ती = लाँघती हुई।
निर्माते = बनाने के लिए।
अनिर्वचनीयः = कहा न जा सकने वाला, अकथनीय

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में दुर्लंघ्य पत्थरों को चूर्ण करके, रुकावटों को हटाकर बहती हुई गंगा के | उपकारों का वर्णन किया गया है

अनुवाद
और यह गंगा हिमालय के कठिनाई से लाँगने  योग्य पत्थरों के टुकड़ों को चूर्ण करती. – हुई, घने वनों की रुकावट को तोड़ती हुई, पर्वतों की गुफाओं में प्रवेश करती हुई, पर्वतों की निचली = और ऊपरी भूमि पर तीव्रगति से विहार करती हुई, नीचे-ऊँचे पर्वत के प्रदेशों को लाँघती हुई हरिद्वार में = समतल भाग में बाधारहित होकर बहती है। आर्यावर्त (भारतवर्ष) की भूमि को हरा-भरा बनाने में गंगा का उपकार कहा नहीं जा सकता। 

(5) वस्तुतः देहः अन्नमयः कोषः कृषिश्चान्नस्य मूलम्। कृषिप्रधाने भारते देश गङ्गा – कृषिभूमिं सिञ्चन्ती अन्नोत्पादने यावत् साहाय्यं वितरति तावन्नान्या कापि सरित्। अस्याः क्षेत्रे  समुत्पन्नानां वनस्पतीनामुपकाराः ओषधीनां लाभाश्च अनिवर्चनीय।

शब्दार्थ
समुत्पन्नानां वनस्पतीनाम् = उत्पन्न हुई वनस्पतियों का।

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में गंगा की कृषि-उपज में वृद्धि करने के गुण का वर्णन किया गया है।

अनुवाद
वास्तव में शरीर अन्नमय कोष है और कृषि अन्न का मूल है। कृषिप्रधान भारत देश में = गंगा कृर्षि की भूमि को सींचती हुई अन्न के उत्पादन में जितनी सहायता देती है, उतनी दूसरी कोई नदी नहीं। इसके क्षेत्र में उत्पन्न होने वाले वनस्पतियों के उपकार और ओषधियों के लाभ अकथनीय हैं। |

(6) गङ्गायाः प्रकृतिमनोहारिणी नैसर्गिकी च शोभा सर्वेषां चित्तमाह्लादयति। हृदयहरिणीमम्बुछटा दशैं दशैं मनः मुग्धं भवति। तटवर्तिनां दर्शनीयस्थानानां शोभां द्रष्टुं देशीयाः। विदेशीयाश्च पर्यटकाः नित्यमिमां सेवन्ते। दिवाकरकिरणैः निशाकररश्मिभिश्च जलस्य शोभा | नितरां वर्धते। गङ्गायाः कूले हरिद्वारे, प्रयागे काश्याञ्च घट्टेषु जलसौन्दर्यं मुहुर्मुहुः वीक्षमाणाः – जनाः अनिवर्चनीयं सुखं शान्ति चानुभवन्ति।

शब्दार्थ
नैसर्गिकी = स्वाभाविक, प्राकृतिक।
आह्लादयति = प्रसन्न करती है।
अम्बुच्छटाम् = जल की शोभा को।
रश्मिभिः = किरणों से।
नितराम् = अत्यधिक।
कूले = किनारे।
मुहुर्मुहुः = बार-बार।
वीक्षमाणाः = देखते हुए।
अनुभवन्ति = अनुभव करते हैं।

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में गंगा की शोभा का वर्णन किया गया है।

अनुवाद
गंगा की प्रकृति से ही मनोहारिणी और स्वाभाविक शोभा सबके चित्त को प्रसन्न करती है। हृदय को आकृष्ट करने वाली जल की शोभा को देख-देखकर मन प्रसन्न हो जाता है। तट पर | स्थित देखने योग्य स्थानों की शोभा को देखने के लिए देश-विदेश के पर्यटक सदा इसके पास बने  रहते हैं (अर्थात् इसके तटीय स्थलों पर ही रहते हैं)। सूर्य की किरणों और चन्द्रमा की रश्मियों में जल की सुन्दरता बहुत अधिक बढ़ जाती है। गंगा के किनारे हरिद्वार, प्रयाग और काशी में घाटों पर जल के सौन्दर्य को बारम्बार देखते हुए लोग अकथनीय सुख और शान्ति का अनुभव करते हैं।

(7) गङ्गायाः पावने कूले नैकानि तीर्थस्थानानि वर्तन्ते। तत्र बदरीनाथः, विष्णुनन्दकर्णरुद्रदेवादिपञ्चप्रयागाः ऋषिकेशहरिद्वारगढमुक्तेश्वरतीर्थराजप्रयागवाराणसीत्यादीनि तपः पूतानि अनेकानि तीर्थस्थानानि चिरकालाद् अध्यात्मचिन्तकांनृषींश्च आकर्षयन्ति। आदिकवेः । वाल्मीकेः भरद्वाजर्वेश्चाश्रमौ अस्याः तीरे आस्ताम्। श्रद्धाभाजनानां रामानुज-वल्लभ-कबीरतुलसी-प्रभृति महापुरुषाणां गङ्गातटमेव प्रेरणास्थलम्। वन्दनीयो गुरुतेग-बहादुरः अस्याः पावने पुलिने घोर तपश्चचार। शङ्कराचार्यसंस्थापिते शृङ्गेरीमठे विघ्नेश्वरीय शिवाय गङ्गोदकार्पण महत्पुण्यमिति सर्वेऽपि श्रद्धया स्वीकुर्वन्ति। |

शब्दार्थ
नैकानि = अनेक।
तपःपूतानि = तपस्या से पवित्र।
अध्यात्मचिन्तकान् = आध्यात्मिक (ईश्वर से सम्बद्ध) चिन्तन करने वालों को।
आकर्षयन्ति = आकर्षित करते हैं।
आस्ताम् = थे।
पुलिने = किनारे पर।
विघ्नेश्वराय = विघ्न-बाधाओं के ईश्वर (शंकर) के लिए।
गङ्गोदकार्पणम् (गङ्गा + उदक + अर्पणम्) = गंगा-जल का अर्पण।
स्वीकुर्वन्ति = स्वीकार करते हैं।

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में गंगा के किनारे पर स्थित तीर्थ-स्थानों और उसके माहात्म्य का वर्णन किया गया है।

अनुवाद
गंगा के पवित्र किनारे पर अनेक तीर्थस्थान हैं। उनमें बद्रीनाथ, विष्णु-नन्द-कर्णरुद्र-देव आदि पाँच प्रयाग, ऋषिकेश, हरिद्वार, गढ़मुक्तेश्वर, तीर्थराज प्रयाग, वाराणसी आदि तप से पवित्र अनेक तीर्थस्थान चिरकाल से अध्यात्म का चिन्तन करने वालों और ऋषियों को आकृष्ट करते हैं। आदिकवि वाल्मीकि और भरद्वाज ऋषि के आश्रम इसके किनारे पर थे। श्रद्धा के पात्र रामानुज, वल्लभाचार्य, कबीर, तुलसी आदि महापुरुषों का प्रेरणा का स्थान गंगा का तट ही रहा है। वन्दना के योग्य गुरु तेगबहादुर ने इसके पवित्र रेत के तट (टीले) पर घोर तप किया था। शंकराचार्य के द्वारा स्थापित शृंगेरी मठ में विघ्नों का नाश करने वाले शिव को गंगा का जल चढ़ाना महान् पुण्य है’, ऐसी सभी श्रद्धा से स्वीकार करते हैं। |

(8) यद्यपि आहिमालयात् सागरपर्यन्तं गङ्गाजले सर्वत्रापि स्नानं तीरे च देवाराधनयज्ञदानादिकर्माणि श्रेयस्कराणि किन्तु तीर्थस्थानेषु सम्पादितं कृत्यं तु बहुपुण्यप्रदम्। हरिद्वारे, त्रिवेण्याः सङ्गमे च कुम्भस्नानं वाराणस्यां दशाश्वमेधघट्टे जलावगाहानन्तरं गङ्गचूडविश्वनाथस्य दर्शनं केचित् सुकृतिनः एव लभन्ते। तीर्थस्थानेषु प्रतिदिनं वेदपुराणशास्त्रादिमानवकल्याणकारिणां ग्रन्थानामध्ययनमध्यापनं व्याख्यानं च भवन्ति। धर्मशास्त्रविषयकालापेषु सद्विचारस्य सौहार्दस्य मानवैकतायाः च आदर्शः पदे पदे दृश्यते। देशदेशान्तरागतः सधनः निर्धनः सामान्यो विशिष्टो वा सर्वे एकस्मिन्नेव घट्टे स्नानं कुर्वन्ति। एवंविधायाः भारतीयसंस्कृतेः सभ्यतायाश्च समाजवादं विलोक्य विदेशीयाः आश्चर्यान्विताः भवन्ति। गङ्गा समस्तं भारतं राष्ट्रियैक्यस्याखण्डतायाश्च सूत्रे बद्ध्वा राष्ट्रं सुदृढीकर्तुं महती भूमिका निर्वहति।।

शब्दार्थ
आहिमालयात् = हिमालय से लेकर।
श्रेयस्कराणि = कल्याण करने वाले।
कृत्यम् = कार्य।
बहुपुण्यप्रदम् = अत्यन्त पुण्य देने वाला।
जलावगाहानन्तरम् = जल में स्नान करने के बाद।
गङ्गचूड = जिसके मस्तक पर गंगा है (शिव)।
सुकृतिनः = पुण्यात्मा।
पदे-पदे दृश्यते = कदम-कदम पर दिखाई देता है।
घट्टे = घाट पर।
बद्ध्वा = बाँधकर।
सुदृढीकर्तुम् = सुदृढ़ करने के लिए।
निर्वहति = निभाती है।

प्रसंग
गंगा के तंटों और घाटों पर स्थित तीर्थों पर स्नान करना पुण्यप्रद है। गंगा भारत को एक सूत्र में बाँधने का महत्त्वपूर्ण कार्य करती है, प्रस्तुत गद्यांश में इन्हीं तथ्यों को आलोकित किया गया है।

अनुवाद
यद्यपि हिमालय से समुद्र तक गंगा के जल में सभी जगह स्नान करना और किनारे पर देवों की आराधना, यज्ञ, दान आदि कार्य (सम्पन्न करना) कल्याणकारी हैं, किन्तु तीर्थस्थानों पर किया गया कार्य बहुत पुण्य देने वाला है। हरिद्वार में और त्रिवेणी के स्नान, वाराणसी में दशाश्वमेध घाट पर जल में स्नान करने के बाद भगवान् गंगचूड़ (गंगा है मस्तक पर जिसके) विश्वनाथ के दर्शन कुछ पुण्यात्मा ही प्राप्त करते हैं। तीर्थस्थानों पर प्रतिदिन वेद, पुराण, शास्त्र आदि मानवों का कल्याण करने वाले ग्रन्थों का पठन-पाठन और व्याख्यान होता है। धर्मशास्त्र के विषयों में सद्विचार, सौहार्द और मानव की एकता को आदर्श पद-पद पर दिखाई देता है। देश-देशान्तरों से आये हुए धनी, निर्धन, साधारण या असाधारण संब एक ही घाट पर स्नान करते हैं। इस प्रकार की भारतीय संस्कृति और सभ्यता को समाजवाद देखकर विदेशी लोग आश्चर्यचकित हो जाते हैं। गंगा समस्त भारत को राष्ट्रीय एकता और अखण्डता के सूत्र में बाँधकर राष्ट्र को सुदृढ़ करने के लिए बड़ी भूमिका निभाती है।

 (9) गङ्गायाः तटे नैकाः विशिष्टाः ऐतिहासिकस्मरणीयाश्च घटनाः सञ्जाताः। रघु-वंशीयाः नृपतयः निखिलविश्वविजयानन्तरं काश्यां दशाश्वमेधघट्टे अश्वमेधः यज्ञानकुर्वन्। तीर्थराजे प्रयागे आयोजिते मेलापके हर्षवर्धनः स्वपरिधानं व्यतिरिच्य सर्वसम्पदं याचकेभ्यः ददाति स्म।अस्या क्रोडे विविधानि राज्यानि उत्कर्षस्य पराकाष्ठां सम्प्राप्य ह्रासमुपगतानि, हस्तिनापुरकान्यकुब्ज-प्रतिष्ठानपुर-काशी-पाटलिपुत्रादीनि नगराणि राजधानीगौरवमावहन्ति स्म। ऐति- ।। हासिकनगराणां निर्माणे विशिष्टघटनानां सङ्टने च गङ्गाप्रवाहस्य भूमिको नाल्पीयसी।

शब्दार्थ
नैकाः = बहुत से।
स्मरणीयाः = स्मरण करने योग्य।
सञ्जाताः = हुई।
निखिलविश्वविजयानन्तरं = समस्त विश्व की विजय के पश्चात्।
मेलापके = मेले में।
स्वपरिधानम् = अपने वस्त्रों को।
व्यतिरिच्य = अतिरिक्त, छोड़कर।
क्रोडे = गोद में।
उत्कर्षस्य = उन्नति का।
पराकाष्ठां = अन्तिम सीमा को।
ह्रासम् = अवनति।
आवहन्ति स्म = धारण करते ते।
सङ्टने = घटने में।
नाल्पीयसी (न + अल्पीयसी) = कम नहीं है।

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में गंगा के तट पर घटित ऐतिहासिक घटनाओं का वर्णन किया गया है।

अनुवाद
गंगा के तट पर अनेक विशिष्ट, ऐतिहासिक और स्मरण के योग्य घटनाएँ हुईं। रघुवंश के राजाओं ने सम्पूर्ण संसार की विजय के पश्चात् काशी में दशाश्वमेध घाट पर अश्वमेध यज्ञ किये। तीर्थराज प्रयाग में आयोजित मेले में हर्षवर्धन अपने वस्त्रों को छोड़कर सारी सम्पत्ति याचकों को दे देते थे। इसकी गोद में अनेक राज्य उन्नति की चरमसीमा को प्राप्त करके अवनति को प्राप्त हुए। हस्तिनापुर, कन्नौज, प्रतिष्ठानपुर, काशी, पाटलिपुत्र (पटना) आदि नगर राजधानी के गौरव को धारण करते थे। ऐतिहासिक नगरों के निर्माण में और विशेष घटनाओं के घटने में गंगा के प्रवाह की भूमिका कम नहीं है।

(10) आधुनिककाले गङ्गातटे नानाविधानि औद्योगिककेन्द्राण्यपि वर्तन्ते। इयं विविधौद्योगिकविकासांयानुकूलमवसरं संयोजयति। रेलमोटरयानाविष्कारपूर्वं नदीमार्गाः गमनागमनसाधनान्यसासन्। अस्मिन् क्षेत्रेऽपि गङ्गायाः लब्धं सौविध्यमवर्णनीयम्। औद्योगिकप्रतिष्ठानानां कृते अस्याः महान् जलराशिः नित्यं प्रयुज्यते। जलप्रवाहसाहाय्येन विद्युद्धारायाः प्रचुरमुत्पादनं सम्पाद्यते येन देशस्य नवनिर्माणं जायते। बुलन्दशहरनामके जनपदे ‘नरौरा’ नामस्थाने गङ्गातटे एतादृशमणुशक्तिसञ्चालितविद्युद्गृहं वर्तते यत्राणु-शक्त्याः समुपयोगः सुतरां क्रियते। ।

शब्दार्थ
संयोजयति = प्राप्त कराती है।
सौविध्यम् अवर्णनीयम् = सुविधा अवर्णनीय है।
प्रयुज्यते = प्रयुक्त होती है।
प्रचुरम् उत्पादनम् = अधिक मात्रा में उत्पादन करना।
सम्पाद्यते = सम्पादित किया जाता है।
जनपदे = जिले में।
सुतरां = अच्छी तरह से।

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में गंगा के औद्योगिक महत्त्व को स्पष्ट किया गया है।

अनुवाद
आधुनिक समय में गंगा के तट पर विविध प्रकार के औद्योगिक केन्द्र भी हैं। यह विविध औद्योगिक विकास के लिए अनुकूल अवसरों को जुटाते हैं। रेलों और मोटरों के आविष्कार से पूर्व नदी के मार्ग गमन और आगमन के साधन थे। इस क्षेत्र में भी गंगा से प्राप्त सुविधा वर्णन से परे है। औद्योगिक कारखानों के लिए इसकी महान् जलराशि नित्य प्रयोग की जाती है। जल के प्रवाह की सहायता से बिजली का प्रचुर उत्पादन  किया जाता है, जिससे देश का नवनिर्माण होता है। बुलन्दशहर नामक जिले में ‘नरौरा’ नामक स्थान पर गंगा के किनारे अणु-शक्तिचालित ऐसा बिजलीघर है, जहाँ अणु-शक्ति का समुचित उपयोग भली-भाँति होता है।

(11) गङ्गाजलस्य वैशिष्ट्यं वैज्ञानिकविश्लेषणेनापि प्रमाणीभूतम्। गङ्गोदकं स्वच्छ, शीतलं, तृषाशामकं, रुचिवर्धकं सुस्वादु रोगापहारि च भवति। तत्र रोगकारकाः जीवाणवः अनायासेन नश्यन्तीति, पाश्चात्यवैज्ञानिकैरपि गङ्गाजलपरीक्षणानिर्विवादतया समुद्घुष्टम्। गङ्गोदकं सर्वविधं पवित्रमिति मत्वा हिन्दुगृहे लघुपात्रे आनीय समादरधिया रक्ष्यते। इदं दीर्घकालेनापि विकृतिं न लभते। मुमूर्षोरपि कण्ठे ‘औषधं जाह्नवीतोयं वैद्यो नारायणो हरिः’ इति मत्वा । गङ्गाजलमेव दीयते। अस्याः महदुपकारमनुभवन्तः जना इमां ‘गङ्गामाता’ इति सम्बोधयन्ति सकलमनोरथसिद्ध्यर्थं पुष्पदीपवस्त्रादीनि समर्पयन्ति च।

शब्दार्थ
वैशिष्ट्यम् = विशिष्टता।
प्रमाणीतम् = प्रमाणित है, सिद्ध है।
तृषाशामकम् = प्यास बुझाने वाला।
रोगापहारि = रोग को दूर करने वाला।
अनायासेन = बिना प्रयत्न के।
निर्विवादतया = विवादरहित रूप से।
समुदघुष्टम् = घोषणा की है।
गङ्गोदकम् = गंगा का जल।
आनीय = लाकर।
समादरधिया = आदर के विचार से।
रक्ष्यते = रखा जाता है।
विकृतिम् = खराब।
मुमूर्षोंः = मरने वाले के।
जाह्नवीतोयम् = गंगा का जल।
दीयते = दिया जाता है।
सम्बोधयन्ति = पुकारते हैं।
समर्पयन्ति = अर्पित करते हैं।

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में गंगा के जल की विशेषता और उपयोगिता बतायी गयी है।

अनुवाद
गंगा के जल की विशेषता वैज्ञानिक विश्लेषण से भी सिद्ध हो चुकी है। गंगा का जल स्वच्छ, शीतल, प्यास बुझाने वाला, रुचि बढ़ाने वाला, स्वादिष्ट और रोग को दूर करने वाला है। उसमें रोग उत्पन्न करने वाले जीवाणु बिना प्रयत्न किये नष्ट हो जाते हैं। ऐसा पाश्चात्य वैज्ञानिकों ने भी गंगा, के जल की परीक्षा करके विवादरहित रूप से घोषणा की है। गंगा का जल सब प्रकार से पवित्र है, ऐसा मानकर हिन्दुओं के घर में छोटे बर्तन में लाकर आदर के विचार से रखा जाता है। यह बहुत समय तक भी खराब नहीं होती है। मरते हुए के भी कण्ठ में गंगा का जल औषध, वैद्य, नारायण हरि हैं’ ऐसा मानकर गंगा का जल ही डाला जाता है। इसके महान् उपकार का अनुभव करते हुए लोग इसे ‘गंगामाता’ नाम से पुकारते हैं और सम्पूर्ण मनोरथों को पूर्ण करने के लिए पुष्प, दीप, वस्त्र आदि चढ़ाते हैं।

(12) हन्त! दौर्भाग्यमिदं यत् साम्प्रतं मनुष्यादेव गङ्गाजलस्य पवित्रताया भयमुपस्थितम्। स्वार्थवशादस्यां तेन बहुविकारा उत्पाद्यन्ते। तटेषु संस्थापितानामौद्योगिकप्रतिष्ठानानां रासायनिकद्रवा अस्याः जले प्रवाह्यन्ते। विपुलजनसङ्ख्याभारतमुवहतां नगराणां मालिन्यं प्रणालिकाभिः गङ्गायाम् प्रक्षिप्यते। घातकरोगाक्रान्तानां मानवानां पशूनाञ्च शवाः वारिधारायां निलीयन्ते। कुलेषु पवित्रमनसा श्रद्धया च निर्मितेष्वैकान्तिकमन्दिरेषु धर्मशालायाञ्च समाजविरोधीनि तत्त्वानि सङ्गच्छन्ते। अज्ञानवशात् ‘प्रमादाच्च मानवः सर्वकल्याणकारिणीं गङ्ग प्रदूषयति, तस्याः जलं प्रदूषयति अमृते विषं मिश्रयति च। हन्त! कीदृशीयं विडम्बना या गङ्गा सर्वशुद्धिकरी प्रख्याता सा सम्प्रति स्वशुद्धये मानवमुखमपेक्षते। मानवस्यैवायं दोषो न गङ्गायाः।

शब्दार्थ
दर्भाग्यमिदम् = यह दुर्भाग्य है।
साम्प्रतम् = इस समय।
उत्पाद्यन्ते = उत्पन्न किये जा रहे हैं।
प्रवाह्यन्ते = बहाये जाते हैं।
मालिन्यम् = मैला, गन्दगी।
प्रणालिकाभिः = नालियों के द्वारा।
निलीयन्ते = डुबाये जाते हैं।
सङ्गच्छन्ते = पहुँचते हैं।
मिश्रयति = मिलाता है।
कीदृशीयं = कैसी यह।
विडम्बना = निन्दनीय बात।
प्रख्याता = प्रसिद्ध है।
मानवमुखमपेक्षते = मनुष्य का मुख देख रही है।

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में मनुष्यों द्वारा गंगा को प्रदूषित किये जाने का वर्णन किया गया है।

अनुवाद
खेद है! यह दुर्भाग्य ही है कि अब मनुष्य से ही गंगा जल की पवित्रता का भय उपस्थित हो गया है। स्वार्थ के कारण वह इसमें बहुत-से-विकार उत्पन्न कर रहा है। तटों पर स्थापति औद्योगिक कारखानों के रासायनिक घोल इसके जल में प्रवाहित किये जाते हैं अधिक जनसंख्या के भार वाले नगरों का मैला नालियों द्वारा गंगा में डाला जाता है। घातक रोग से आक्रान्त मनुष्यों और पशुओं के शव जल की धारा में डुबोये जाते हैं। किनारों पर पवित्र मन और श्रद्धा से बनाये गये एकान्त मन्दिरों और धर्मशालाओं में समाज-विरोधी तत्त्व मिल जाते हैं। अज्ञान के कारण और प्रमाद से मनुष्य सबका कल्याण करने वाली गंगा को प्रदूषित कर रहा है, उसके जल को प्रदूषित कर रहा है और अमृत में विष घोल रहा है। खेद! यह कैसी विडम्बना (निन्दित बात) है कि जो गंगा सबको पवित्र करने वाली प्रसिद्ध है, वह अब अपनी शुद्धता के लिए मानव का मुँह देख रही है। यह मानव का ही दोष है, गंगा का नहीं।।

(13) सौभाग्यात् भारतीयशासेन गङ्गाप्रदूषणस्य विनाशाय महती योजना सञ्चालिता। केन्द्रीयुविकासप्राधिकरणेन प्रदूषणमपाकर्तुं शुचिताञ्च प्रतिष्ठापयितुं योजनाबद्ध कार्यमारब्धम्। चलचित्रदूरदर्शनाकाशवाणीसमाचारपत्रादिसञ्चारमाध्यमैः गङ्गाप्रदूषणं निवारयितुं जनचेतना प्रबोध्यते। परं महानयं राष्ट्रियः कार्यक्रमः क्षेत्रञ्च विशालम्। स्वल्पैः जनैः शासनतन्त्रैर्वा तदनुष्ठातुं न शक्यते। तत्र आबालवृद्धानां स्त्रीपुरुषाणां सक्रियसहयोगस्य अहर्निशमावश्यकता वर्तते। यदा सर्वे जनाः मनसा वाचा कर्मणा निष्ठया च गङ्गायाः प्रदूषणमपसारयितुं कृतसङ्कल्पास्तदनुरूपेवाचरणशीलश्च भविष्यन्ति तदैवास्याः नैर्मल्यं रक्षिष्यते पुण्यसलिला गङ्गा जगद्धात्री भविष्यत्येव।

अपरञ्च अहो गङ्गा जगद्धात्री स्नानपानादिभिर्जगत्।
 पुनाति पावनीत्येषा न कथं सेव्यते नृभिः॥

शब्दार्थ
अपाकर्तुं = दूर करने के लिए।
शुचितां = पवित्रता को।
प्रतिष्ठापयितुम् = पुनः लाने के लिए।
योजनाबद्धम् = योजना बनाकर।
निवारयितुम् = मिटाने के लिए।
प्रबोध्यते = जाग्रत की ।जा रही है।
तदनुष्ठातुम् = वह पूरा करने के लिए।
आबालवृद्धानाम् = बच्चों से लेकर बूढ़ों तक का।
अहर्निशं = दिन-रात (चौबीस घण्टे)।
निष्ठया = श्रद्धा से।
अपसारयितुम् = दूर करने के लिए।
नैर्मल्यम् = पवित्रता को।
जगद्धात्री = संसार का पालन करने वाली।
पुनाति = पवित्र करती है।
नृभिः = मनुष्यों के द्वारा।

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में गंगा के प्रदूषण को रोकने के लिए सरकारी प्रयत्नों और जनता के सहयोग की आवश्यकता का वर्णन किया गया है।

अनुवाद
सौभाग्य से भारत की सरकार ने गंगा-प्रदूषण समाप्त करने के लिए बड़ी योजन चलायी है। केन्द्रीय विकास प्राधिकरण ने प्रदूषण को दूर करने और पवित्रता को पुनः लाने के लिए योजना बनाकर कार्य आरम्भ कर दिया है। सिनेमा, दूरदर्शन, आकाशवाणी, समाचार-पत्र आदि संचारमाध्यमों के द्वारा गंगा के प्रदूषण को दूर करने के लिए जनचेतना जगायी जा रही है, परन्तु यह राष्ट्रीय कार्यक्रम बड़ा है और क्षेत्र विशाल है। थोड़े लोगों अथवा शासनतन्त्र के द्वारा यह पूरा नहीं किया जा सकता है। उसमें बच्चों से लेकर बूढ़े, स्त्री-पुरुषों तक के सक्रिय सहयोग की रात-दिन आवश्यकता है। जब सब मनुष्य मन से, वचन से, कार्य से और लगन से गंगा के प्रदूषण को दूर करने के लिए संकल्प (प्रतिज्ञा) करेंगे और उसके अनुसार आचरण करेंगे, तभी इसकी पवित्रता की रक्षा की जा सकेगी। पवित्र जल वाली गंगा संसार का पालन करने वाली होगी ही। और यह जगत् का पालन करने वाली गंगा स्नान, जलपान आदि द्वारा संसार को पवित्र करती है। इस प्रकार पवित्र करने वाली यह लोगों के द्वारा कैसे नहीं सेवन की जाती है; अर्थात् अवश्य ही सेवन की जाती है।

लघु उत्तरीय प्ररन

प्ररन 1
गंगा किस प्रकार धरती पर आयी, इसका वर्णन कीजिए।
उत्तर

[संकेत-‘पाठ-सारांश’ मुख्य शीर्षक के अन्तर्गत आये शीर्षक ‘उद्गम’ और ‘पौराणिक स्वरूप की सामग्री को अपने शब्दों में लिखें।

प्ररन 2
गंगा के प्रदूषित होने और प्रदूषण से मुक्ति पर प्रकाश डालिए
उत्तर

[संकेत-‘पाठ-सारांश’ मुख्य शीर्षक के अन्तर्गत आये शीर्षकों-‘जल-प्रदूषण की समस्या’ और ‘प्रदूषण दूर करने के प्रयास’–से सम्बन्धित सामग्री को संक्षेप में अपने शब्दों में लिखें।]

प्ररन 3
गंगा के तट पर बसे नगरों, निवास करने वाले धर्माचार्यों तथा लगने वाले मेलों का वर्णन कीजिए।
उत्तर
गंगा के तट पर बदरीनाथ, पंचप्रयाग, ऋषिकेश, हरिद्वार, गढ़मुक्तेश्वर, तीर्थराज प्रयाग, वाराणसी आदि तीर्थस्थान (नगर) हैं। वाल्मीकि और भरद्वाज के आश्रम भी गंगा के तट पर ही थे। रामानुज, कबीर, तुलसी आदि महापुरुषों के प्रेरणास्थल भी गंगा के तट ही रहे हैं। प्रयाग में गंगा के तट पर लगने वाले मेले में ही हर्षवर्धन अपना सर्वस्व दान किया करते थे।

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