Chapter 18 महर्षि दयानन्द

पाठ का सारांश

महर्षि दयानन्द का बचपन का नाम मूलशंकर था। इसका जन्म सम्पन्न ब्राह्मण परिवार में सन् 1824 ई० को गुजरात के टकरा गाँव में हुआ। इनके पिता का नाम कर्षन जी त्रिवेदी और माता का नाम शोभाबाई था। मूलशंकर का मन अध्ययन और एकान्त चिन्तन में अधिक लगता था। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा संस्कृत में हुई। ये कुशाग्र बुद्धि और विलक्षण स्मृति वाले छात्र थे।

सोलह वर्ष की आयु में मूलशंकर के जीवन में छोटी बहन की हैजे से मृत्यु होने से इनमें वैराग्य भावना पैदा हो गई। इसके तीन वर्ष बाद मूलशंकर को स्नेह करने वाले चाचा को भी देहान्त हो गया। 21 वर्ष की आयु में ये चुपचाप घर से निकल पड़े। सायले गाँव (अहमदाबाद) में जाकर एक ब्रह्मचारी जी से दीक्षा लेकर शुद्ध चैतन्य ब्रह्मचारी बन गए। इसके बाद नर्मदा के तट पर दण्डी स्वामी पूर्णानन्द सरस्वती से संन्यास की दीक्षा लेकर ये दयानन्द सरस्वती हो गए। दीक्षा के उपरान्त इन्होंने  सारा समय विद्याध्ययन और योगाभ्यास में लगाया। इन्होंने द्वारिका के स्वामी महात्मा शिवानन्द से योग विद्या का ज्ञान प्राप्त किया। इसके बाद मथुरा के स्वामी विरजानन्द के चरणों में दयानन्द ने ‘अष्टाध्यायी म्हाभाष्य और ‘वेदान्त सूत्र’ आदि अनेक ग्रन्थों का अध्ययन किया। विद्याध्ययन की समाप्ति पर गुरु के आदेशों का पालन करने की प्रतिज्ञा की। गुरु का आदेश था- “वत्स दयानन्द! जंगलों में एकान्त साधना में संन्यास की पूर्णता नहीं है। कुसंस्कारों और अन्धविश्वासों का खण्डन करके समाज का उद्धार करो।”

स्वामी दयानन्द ने जीवनभर आडम्बरों का विरोध किया। उन्होंने महान ग्रन्थ ‘सत्यार्थ प्रकाश’ लिखा जिसमें धर्म, समाज, राजनीति, नैतिकता एवं शिक्षा पर उनके संक्षिप्त विचार दिए गए हैं। सन् 1875 ई० में स्वामी जी ने ‘आर्य-समाज’ की स्थापना की। इसका मुख्य उद्देश्य सभी मनुष्यों के शारीरिक, आध्यात्मिक और सामाजिक स्तर को उठाना था।

उन्होंने वेदों और संस्कृत साहित्य के अध्ययन पर बल दिया। उन्होंने नारी शिक्षा पर भी बल दिया। उन्होंने पर्दा प्रथा और बाल-विवाह का विरोध किया। विधवा विवाह और पुनर्विवाह का समर्थन किया। समाज में व्याप्त वर्ण-भेद, असमानता और छुआछूत की भावना का भी उन्होंने खुलकर विरोध किया। उन्होंने संस्कृत भाषा और धर्म को ऊँचा स्थान दिलाने के लिए हिन्दी भाषा को प्रतिष्ठित किया।  महर्षि दयानन्द समाज सुधारक और आर्य संस्कृति के रक्षक थे। मानव कल्याण की कामना करने वाले महर्षि दयानन्द का जीवन-दीप सन् 1883 ई० को कार्तिक की अमावस्या को सहसा बुझ गया। स्वामी दयानन्द 19वीं सदी के भारत के पुनर्जागरण के प्रेरक व्यक्ति थे।

अभ्यास-प्रश्न

प्रश्न 1.
स्वामी पूर्णानन्द सरस्वती से संन्यास की दीक्षा लेने के बाद मूलशंकर किस नाम से पुकारे जाने लगे?
उत्तर :
दीक्षा लेने के बाद मूलशंकर ‘स्वामी दयानन्द सरस्वती’ के नाम से पुकारे जाने लगे।

प्रश्न 2.
गुरु विरजानन्द ने स्वामी दयानन्द को क्या उपदेश दिया था?
उत्तर :
गुरु विरजानन्द ने स्वामी दयानन्द को यह उपदेश दिया था, “वत्स दयानन्द जंगलों में जाकर एकान्त चिन्तन में संन्यास की पूर्णता नहीं है….. कुसंस्कारों और अन्धविश्वासों को खण्डन करके समाज • का उद्धार करो।”

प्रश्न 3.
आर्य समाज की स्थापना किस उद्देश्य को लेकर की गयी थी?
उत्तर :
आर्य समाज की स्थापना का उद्देश्य सभी मनुष्यों के शारीरिक, आध्यात्मिक और सामाजिक स्तर को ऊपर उठाना था।

प्रश्न 4.
दयानन्द सरस्वती के समाज सुधार सम्बन्धी कार्यों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर :
स्वामी दयानन्द ने प्राचीन संस्कृति और सभ्यता की ओर लोगों का ध्यान आकृष्ट किया। उन्होंने वेदों और संस्कृत पर बल दिया। उन्होंने नारी शिक्षा पर भी बल दिया। उन्होंने पर्दा प्रथा और बाल विवाह का विरोध किया। उन्होंने विधवा विवाह और पुनर्विवाह का समर्थन किया। समाज में व्याप्त वर्ण-भेद, असमानता और छुआछूत की भावना का खुलकर विरोध किया। वे महान सुधारक और भारतीय संस्कृति के रक्षक थे।

प्रश्न 5.
स्वामी दयानन्द सरस्वती के विषय में रवीन्द्र नाथ टैगोर ने क्या कहा था?
उत्तर :
स्वामी दयानन्द सरस्वती के विषय में रवीन्द्र नाथ टैगोर ने कहा था कि स्वामी दयानन्द 19वीं शताब्दी में भारत के पुनर्जागरण को प्रेरक व्यक्ति थे। उन्होंने भारतीय समाज के लिए एक ऐसा मार्ग प्रशस्त किया जिसपर चलकर भारतीय समाज समुन्नत किया जा सकता है।

प्रश्न 6.
रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए (पूर्ति करके)
(क) महर्षि दयानन्द को जन्म सन् 1824 ई० में हुआ था।
(ख) मूलशंकर संन्यास की दीक्षा लेने के पश्चात स्वामी दयानन्द सरस्वती कहलाए।
(ग) स्वामी दयानन्द ने द्वारिका के स्वामी शिवानन्द से योग विद्या का ज्ञान प्राप्त किया।
(घ) आर्य समाज की स्थापना का मुख्य उद्देश्य सभी मनुष्यों के शारीरिक और आध्यात्मिक स्तर को ऊपर उठाना था।

प्रश्न 7.
सही (✓) और गलत (✗) का निशान लगाइए (सही-गलत का निशान लगाकर)
(अ) दयानन्द सरस्वती ने महान धर्मग्रन्थ ‘सत्यार्थ प्रकाश’ लिखा। (✓)
(ब) स्वामी दयानन्द ने दिल्ली में आर्य समाज की स्थापना की। (✗)
(स) स्वामी दयानन्द ने पर्दा प्रथा तथा बाल-विवाह जैसी कुरीतियों का विरोध किया। (✓)
(द) स्वामी दयानन्द का जीवन-दीप 1885 में बुझ गया। (✗)

प्रश्न 8.
स्वामी दयानन्द के जीवन दर्शन को संक्षेप में वर्णित कीजिए।
उत्तर :
स्वामी दयानन्द का जीवन दर्शन-कोई भी सद्गुण सत्य से बड़ा नहीं है। कोई ज्ञान भी सत्य से बड़ा नहीं है। इसलिए मनुष्य को सदा सत्य का पालन करना चाहिए। परमात्मा के रचे पदार्थ सब प्राणियों के  लिए एक से हैं। इसलिए ईश्वर प्रदत्त धर्म भी सब मनुष्यों के लिए एक ही होना चाहिए। धर्म के नाम पर समाज का भिन्न-भिन्न सम्प्रदायों में बँटा होना ईश्वरीय नियम के प्रतिकूल है।

प्रश्न 9.
महर्षि दयानन्द सरस्वती के किन-किन गुणों से आप प्रभावित हैं? उन गुणों को स्वयं में कैसे विकसित करेंगे।
उत्तर :
स्वामी दयानन्द सरस्वती की कुशाग्र बुद्धि, विलक्षण स्मरण शक्ति, अध्ययनशीलता, प्राचीन भारतीय संस्कृति के प्रति लगाव, सदा सत्य का पालन, एक ईश्वर प्रदत्त धर्म में विश्वास, स्वदेश प्रेम, परोपकार की भावना, मानव प्रेम और सहिष्णुता आदि गुणों से हम प्रभावित हैं। हमें इन गुणों में से कुछ को अपनाने के लिए स्वयं में लगन, अभ्यास और रुचि पैदा करनी होगी।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *