Chapter 7 सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन’ अज्ञेय’

कवि का साहित्यिक परिचय और कृतिया

प्रश्न 1.
अज्ञेय के जीवन-परिचय और कृतियों पर प्रकाश डालिए। [2009, 10, 11]
या
सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ का साहित्यिक परिचय देते हुए उनकी कृतियों का उल्लेख कीजिए। (2012, 13, 14, 15, 16, 18]
उत्तर
जीवन-परिचय-अज्ञेय जी का जन्म सन् 1911 ई० में करतारपुर (जालन्धर) में हुआ था। इनके पिता पं० हीरानन्द शास्त्री भारत के प्रसिद्ध पुरातत्त्ववेत्ता थे। ये वत्स गोत्र के और सारस्वत ब्राह्मण परिवार के थे। संकीर्ण जातिवाद से ऊपर उठकर वत्स गोत्र के नाम से ये वात्स्यायन कहलाये। अज्ञेय जी का शैशव अपने पिता के साथ वन और पर्वतों में बिखरे पुरातत्त्व अवशेषों के मध्य व्यतीत हुआ। माता और भाइयों से अलग एकान्त में रहने के कारण इनका जीवन और व्यक्तित्व कुछ विशेष प्रकार का बन गया। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा पुराने ढंग से अष्टाध्यायी रटकर संस्कृत में हुई। इसके बाद इन्होंने फारसी और अंग्रेजी सीखी। इनकी आगे की शिक्षा मद्रास (चेन्नई) और लाहौर में हुई। सन् 1929 ई० में बी० एस-सी० उत्तीर्ण करने के उपरान्त ये अंग्रेजी में एम० ए० के अन्तिम वर्ष में ही थे कि क्रान्तिकारी आन्दोलनों में भाग लेने के कारण गिरफ्तार कर लिये गये। चार वर्ष जेल में और एक वर्ष घर में ही नजरबन्द रहकर व्यतीत करना पड़ा। इन्होंने मेरठ के किसान आन्दोलन में भाग लिया था और तीन वर्ष तक सेना में भरती होकर असम-बर्मा सीमा पर और यहाँ युद्ध समाप्त हो जाने पर पंजाब के पश्चिमोत्तर सीमान्त पर सैनिक रूप में सेवा भी की। सन् 1955 ई० में यूनेस्को की वृत्ति पर आप यूरोप गये तथा सन् 1957 ई० में जापान और पूर्वेशिया का भ्रमण किया। कुछ समय तक ये अमेरिका में भारतीय साहित्य और संस्कृति के प्राध्यापक रहे तथा जोधपुर विश्वविद्यालय में तुलनात्मक साहित्य और भाषा अनुशीलन विभाग में निदेशक पद पर भी कार्य किया। ये ‘दिनमान’ और ‘नया प्रतीक’ पत्रों के सम्पादक भी रहे।

साहित्य के अतिरिक्त चित्रकला, मृत्तिका-शिल्प, फोटोग्राफी, बागवानी, पर्वतारोहण आदि में ये विशेष रुचि लेते थे। 4 अप्रैल, 1987 ई० को इनका स्वर्गवास हो गया। इन्हें मरणोपरान्त ‘भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

साहित्यिक सेवाएँ-अज्ञेय जी की रचनाओं में उनका व्यक्तित्व बहुत मुखर रहा है। वे प्रयोगवादी कवि के रूप में विख्यात हैं और उनकी प्रतिभा निरन्तर परिमार्जित होती रही है। प्रगतिवादी काव्य का ही एक रूप प्रयोगवादी काव्य के आन्दोलन में प्रतिफलित हुआ। इसका प्रवर्तन ‘तार सप्तक’ के द्वारा अज्ञेय जी ने ही किया था। इन्होंने अपने कलात्मक बोध, समृद्ध कल्पना-शक्ति और संकेतमयी अभिव्यंजना द्वारा भावना के अनेक नये अनछुए रूपों को उजागर किया।

प्रमुख रचनाएँ—(1) आँगन के पार द्वार, (2) सुनहले शैवाल, (3) पूर्वा, (4) हरी घास पर क्षण भर, (5) बावरा अहेरी, (6) अरी ओ करुणामय प्रभामय, (7) इन्द्रधनु रौंदे हुए ये, (8) कितनी नावों में कितनी बार, (9) पहले मैं सन्नाटा बुनता हूँ, (10) इत्यलम्, (11) चिन्ता, (12) सागरमुद्रा, (13) महावृक्ष के नीचे, (14) भग्नदूत, (15) रूपांवरा, (16) नदी के बॉक पर छाया आदि इनके प्रमुख काव्य ग्रन्थ हैं। ‘प्रिज़न डेज़ ऐण्ड अदर पोयम्स’ नाम से इनकी अंग्रेजी भाषा में रचित एक अन्य काव्य-कृति भी प्रकाशित हुई है।

साहित्य में स्थान–अज्ञेय की सतत प्रयोगशील प्रतिभा किसी एक बँधी-बँधायी लीक पर चलने वाली न थी, फलतः इन्होंने काव्य के भावपक्ष तथा कलापक्ष दोनों में नये-नये प्रयोग करके हिन्दी-कविता के भावक्षेत्र का विस्तार किया तथा अभिव्यक्ति को नूतन व्यंजकता प्रदान की। अत: इनके विषय में यह नि:संकोच कहा जा सकता है कि इन्होंने हिन्दी कविता का नव संस्कार किया। ये प्रयोगवादी काव्यधारा के प्रवर्तक तथा आधुनिक हिन्दी कवियों में उच्च स्थान के अधिकारी हैं।

पद्यांशों पर आधारित प्रश्नोर

मैंने आहुति बनकर देखा

प्रश्न–दिए गए पद्यांश को पढ़कर उस पर आधारित प्रश्नों के उत्तर लिखिए-

प्रश्न 1.
वे रोगी होंगे प्रेम जिन्हें अनुभव-रस का कटु प्याला है-
वे मुर्दे होंगे प्रेम जिन्हें सम्मोहन-कारी हाला है।
मैंने विदग्ध हो जान लिया, अन्तिम रहस्य पहचान लिया-
मैंने आहुति बनकर देखा यह प्रेम यज्ञ की ज्वाला है !
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) कवि ने रोगी किसे बताया है?
(iv) किनको संवेदनाहीन मृतक की संज्ञा दी गयी है?
(v) कवि ने यह कैसे सिद्ध किया है कि प्रेम यज्ञ की ज्वाला के समान पवित्र और कल्याणकारी
उत्तर
(i) प्रस्तुत पंक्तियाँ प्रयोगवाद के प्रवर्तक श्री सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन’अज्ञेय’ द्वारा रचित ‘पूर्वा’ कविता-संग्रह से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘मैंने आहति बनकर देखा’ शीर्षक कविता से उद्धृत हैं।
अथवा
शीर्षक का नाम- मैंने आहुति बनकर देखा।
कवि का नाम–सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या-कवि अज्ञेय का कहना है कि प्रेम जीवन में माधुर्य और सरसता का संचार करता है तथा व्यक्ति को एक नवीन चेतना और उत्साहित करने वाली नव-प्रेरणा प्रदान करता है। यह निष्प्राण व्यक्ति में भी प्राण डाल देता है। कवि कहता है कि मैंने स्वयं अनुभूत करके प्रेम के सच्चे स्वरूप और उसकी महत्ता को जान लिया है। मुझे प्रेम का यह तत्त्व अथवा रहस्य ज्ञात हो गया है कि प्रेम यज्ञ की उस ज्वाला के समान पवित्र और कल्याणकारी है, जो भौतिक एवं आध्यात्मिक दोनों ही दृष्टियों से व्यक्ति के लिए आवश्यक और मंगलकारी है। साथ ही प्रेम के इस मंगलकारी स्वरूप की अनुभूति तथा प्रेमरूपी यज्ञ की ज्वाला के दर्शन उसी समय सम्भव हो पाते हैं, जब व्यक्ति स्वयं प्रेमरूपी यज्ञ में अपनी आहुति देता है। आशय यह है कि कठिनाइयों और बाधाओं को पार करके तथा संघर्ष में तपकर ही हम प्रेम के तत्त्व को पहचान सकते हैं।
(iii) कवि ने उन लोगों को रोगी बताया है जो प्रेम को कटु अनुभवों का प्याला बताते हैं।
(iv) जो लोग प्रेम को अचेतन करने वाली मदिरा कहते हैं उनको संवेदनाहीन मृतक की संज्ञा दी है।
(v) कवि ने स्वयं व्यक्तिगत गहन अनुभूमि के आधार पर यह सिद्ध किया है कि प्रेम यज्ञ की ज्वाला के समान पवित्र और कल्याणकारी है।

हिरोशिमा

प्रश्न 1.
छायाएँ मानव-जन की
नहीं मिटीं लम्बी हो-होकर :
मानव ही सब भाप हो गये।
छायाएँ तो अभी लिखी हैं,
झुलसे हुए पत्थरों पर
उजड़ी सड़कों की गच पर ।
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) प्रस्तुत अंश में किसका वर्णन हुआ है?
(iv) परमाणु हमले से कहाँ पर तुरन्त ही सब कुछ समाप्त हो गया?
(v) हिरोशिमा की उजड़ी सड़कों पर आज भी कितनी काली छायाएँ देखी जा सकती हैं?
उत्तर
(i) प्रस्तुत पंक्तियाँ प्रयोगवाद के प्रवर्तक श्री सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन’अज्ञेय’ द्वारा रचित ‘पूर्वा’ कविता-संग्रह से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘हिरोशिमा’ शीर्षक कविता से उद्धृत हैं।
अथवा
शीर्षक का नाम- हिरोशिमा।
कवि का नाम–सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या-‘अज्ञेय’ जी ने कहा है कि परमाणु शक्ति के दुरुपयोग से मानवता त्रस्त होती है। मानव के साथ-साथ प्रकृति और दूसरे जीव-जन्तु भी समूल नष्ट हो जाते हैं। द्वितीय विश्व युद्ध के अन्त में अमेरिका ने जापान देश के हिरोशिमा और नागासाकी नगरों पर परमाणु बमों से हमला किया तो मनुष्य द्वारा रचे गये उस सूर्य की रोशनी में वहाँ की जनता भाप बन कर उड़ गयी थी। लोगों की छायाएँ डूबते सूर्य के प्रकाश में जैसे लम्बी होकर मिटती हैं, वैसी हिरोशिमा में नहीं मिटी थीं, वहाँ तुरन्त ही सब कुछ समाप्त हो गया था। आज तक भी वहाँ की उजड़ी सड़कों और परमाणु बमों की आग से झुलसे पत्थरों पर उस त्रासदी की काली छायाएँ स्पष्ट देखी जा सकती हैं।
(iii) प्रस्तुत अंश में अमेरिका के परमाणु बमों द्वारा जापान के हिरोशिमा और नागासाकी नगरों में हुए भीषण नर-संहार का वर्णन हुआ है।
(iv) हिरोशिमा और नागासाकी नगरों में परमाणु हमले से तुरन्त ही सब-कुछ समाप्त हो गया।
(v) हिरोशिमा की उजड़ी सड़कों पर परमाणु बस की आग से झुलसे पत्थरों पर उस त्रासदी की काली छायाएँ स्पष्ट देखी जा सकती हैं।

प्रश्न 2.
मानव का रचा हुआ सूरज
मानव को भाप बनाकर सोख गया।
पत्थर पर लिखी हुई यह
जली हुई छाया
मानव की साखी है।
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) मानव का रचा हुआ सूरज क्या है?
(iv) अणुबमरूपी सूरज किसे और किस प्रकार भाप बनाकर सोख गया?
(v) कौन आज भी महाविनाश के गवाह हैं?
उत्तर
(i) प्रस्तुत पंक्तियाँ प्रयोगवाद के प्रवर्तक श्री सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘हिरोशिमा’ द्वारा रचित ‘पूर्वा’ कविता-संग्रह से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित हिरोशिमा’ शीर्षक कविता से उद्धत हैं।
अथवा
शीर्षक का नाम-हिरोशिमा।
कवि का नाम-सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’।।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या–परमाणु बम के रूप में मनुष्य ने मानो कृत्रिम सूरज की रचना कर ली है। इसके विस्फोट में सूरज के समान ही अत्यधिक ताप उत्पन्न होता है। अमेरिका ने जब हिरोशिमा पर परमाणु बम गिराया तो विस्फोट के समय उससे इतना ताप और प्रकाश उत्पन्न हुआ कि लगा आसमान से टूटकर सूरज ही धरती पर आ गिरा हो। उस समय मनुष्य भाप बनकर उड़ गया और उसकी राख तक शेष न रही। सूर्य में भी इतना ही ताप है कि उसके पास पहुँचकर कोई भी वस्तु ठोस अथवा द्रव अवस्था में नहीं रहती, वरन् वह गैस में परिवर्तित हो जाती है, ऐसा ही हिरोशिमा के परमाणु बम विस्फोट के समय हुआ था। जहाँ पर बम गिरा था, वहाँ की अधिकांश वस्तुएँ विशेषकरे पेड़-पौधे और जीव-जन्तु अत्यधिक ताप के कारण भाप (गैस) बनकर उड़ गये थे। यह वैज्ञानिक प्रगति के महाविनाश का प्रथम प्रमाण था।
(iii) मानव का रचा हुआ सूरज अणुबम है।
(iv) अणुबमरूपी सूरज ने मनुष्यों को उसी प्रकार जलाकार भस्म कर डाला जिस प्रकार सूर्य पानी को भाप बना डालता है।
(v) अणुबम की आग ने मानव तो मानव, पत्थर तक को जलाकर काला कर डाला, जो आज भी उस महाविनाश की गाथा के गवाह हैं।

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